आंत्र प्रदाह का होम्योपैथिक इलाज [ Homeopathic Medicine For Catarrhal Enteritis ]

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इसे “कैटरल ऐण्टेराइटिस” कहते हैं। जब छोटी आंत में प्रदाह होता है, तब उसको अंत्र-प्रदाह कहते हैं, पर जब छोटी आंत की श्लैष्मिक-झिल्ली का प्रदाह हो जाता है, तब उसको “कैटरल ऐण्टेराइटिस” कहते हैं; और जब श्लैष्मिक-झिल्ली तथा उसके साथ ही आंतों के दूसरे-दूसरे आवरणों में भी प्रदाह हो जाता है, तो उसको “फ्लेगमोनस-ऐण्टेराइटिस” कहते हैं। वृहद्-अंत्र अर्थात कोलन के प्रदाह का नाम “कोलाइटिस” (वृहदंत्र-प्रदाह) है। यह रक्तामाशय से बिल्कुल ही अलग रोग है। यह रोग सभी ऋतुओं में और सभी समय होता है; पर संख्या में छोटे बच्चों को ही ज्यादा होता है। एक बार आराम हो जाने पर भी इसके फिर से होने की संभावना रहती है। यह रोग निम्न दो तरह से पैदा होता है

प्राइमरी ऐक्युट-फार्म

यह बहुत अधिक खाने-पीने और आहार की गड़बड़ी से होने वाला रोग है; गरिष्ठ चीजें खाना-पीना, तेज जुलाब लेना, सर्दी लगना, पेट में कोई खाद्य जाकर सड़ना या विषाक्त हो जाना, उत्तेजक औषधियों का सेवन, एकाएक ऋतु-परिवर्तन, गर्मी से आकर सर्दी लगा लेना, गर्मी के दिनों का अतिसार, आंतों में बहुत अधिक पित्त संचय होकर उससे आंतों की क्रिया में गड़बड़ी होना, आंतों के भीतर कड़ा मल रुक जाने से सख्त कब्ज होना, आंतों में कृमि, एकाएक डर जाना, क्रोध इत्यादि स्नायु की उत्तेजना आदि कारणों से इस रोग की उत्पत्ति होती है।

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सेकेण्डरी-फार्म

आंत उतरना (हर्निया) और अंत्रावरक-झिल्ली के प्रदाह का बढ़ना या फैलना, यकृत की क्षीणता, फेफड़े और हुत्पिण्ड के किसी पुराने रोग आदि में रक्त-संचालन क्रिया की गड़बड़ी, सूतिका, वातश्लैष्मिक-विकार (टाइफॉयड), हैजा (कॉलेरा), रक्तामाशय (डिसेण्ट्री), फुसफुस-प्रदाह (न्युमोनिया), विषाक्त-रक्त (पाइमिया), पीत-ज्वर (सेप्टीसिमिया) आदि रोगों के गौण फल से अंत्र-प्रदाह होता है। शरीर का अधिक अंश जल जाने से और रक्ताल्पता (एनीमिया), मूत्रथि-प्रदाह आदि के कारण यह रोग होता है।

छोटी आंत पर आक्रमण होने पर कॉलिक अर्थात् शूल के दर्द की तरह दर्द होता है, पेट के चारों ओर अकड़न रहती है, जल्दी-जल्दी दस्त नहीं आते हैं, किंतु पेट हमेशा ही फूला रहता है। मल का रंग पीला, भूरा या हरे रंग के दस्तों के साथ अजीर्ण खाद्य मिला रहता है, कभी-कभी थोड़ी आंव या रक्त रहता है।

बड़ी आंत पर आक्रमण होने पर मल के समय दर्द और कुथन रहती है; बड़ी आंत की जगह पर छूने से दर्द होता है, बहुत जल्दी-जल्दी पतले दस्त आते हैं। मल के साथ रक्त और आंव का परिमाण खूब अधिक रहता है, यहां तक कि कितनी ही बार मल एकदम नहीं रहता।

इस रोग में संपूर्ण रूप से विश्राम की आवश्यकता है, रोगी को सदैव बिस्तार पर लेटे रहना चाहिए। रोग की प्रबल अवस्था में उपवास करना ही उचित है। प्यास रोकने के लिए बरफ के टुकड़े चूसने को दिए जाएं, तो लाभ होता है। कड़े फल का अंश, गुठली, मांस के टुकड़े इत्यादि यदि पेट में एकत्रित हो गए हों, तो पहले कैस्टर ऑयल का जुलाब देकर उन्हें निकाल देना ही अच्छा है। इसके बाद साबू, बार्ली, आरारोट, विदाना का रस, दूध, खूब नरम और अच्छी तरह सिझे चावलों को मात दूध के साथ मथकर खाने को दिया जा सकता है। पेट का दर्द दूर करने के लिए गरम सेंक की व्यवस्था करनी चाहिए। रोग थोड़ा घट जाए, भूख बढ़े और ऐसा मालूम हो कि कड़ी चीज भी पचेगी, तब पॉव रोटी का टोस्ट बनाकर, उसके भीतर का अंश थोड़े गरम दूध में डालकर मिश्री की बुकनी के साथ खिलानी चाहिए। चर्बी और श्वेतसार मिला पदार्थ खाना एकदम मना है। विशेषतः दूध ही प्रधान पथ्य है। बहुत आवश्यकता आ पड़े, तो स्टार्ची-फूड (श्वेतसारीय पदार्थ) बहुत थोड़ी मात्रा में दिया जा सकता है। इसमें एकदम विश्राम और रोगी को बिस्तर पर आराम कराए रखना आवश्यक है।

साधारण अतिसार और आमाशय में जिन औषधियों का व्यवहार होता है, इन सब रोगों में भी ठीक उन्हीं सब औषधियों की आवश्यकता पड़ती है। होम्योपैथी में किसी रोग के नाम से कोई बंधी औषधि नहीं है, लक्षण मिलने पर जो औषधि ज्वर और हैजा में व्यवहृत होती है, वही औषधि अतिसार, आमाशय, अंत्र-प्रदाह, अंत्रावरक झिल्ली-प्रदाह आदि रोगों में व्यवहृत हुआ करती है।

नए अंत्र-प्रदाह में — एकोनाइट, एलो, एसिड-बेंजो, एण्टिम क्रूड, इथूजा, एपिस; अर्जेण्ट-नाइट्रि, आर्स, बेल, कार्बो, कैमो, चायना, कोलोसिंथ, क्रोटोन, इपिकाक, आइरिस, जैट्रोफो, मैग-कार्ब, मर्क्युरियस, नक्स, पोडो, पल्स, वेरेट्रम इत्यादि देनी चाहिए।

पुराने रोग में — ऊपरी औषधियां और ग्रैफाइटिस, लाइको, सल्फर, सल्फ्युरिक एसिड, कूपम, सिकेलि और कैम्फर इत्यादि देनी चाहिए।

एकोनाइट 6 — रोग की पहली अवस्था में बार-बार थोड़ा-थोड़ा दस्त, कराहना, पित्त और आंवयुवत हरे दस्त में यह औषध दी जाती है।

एलो 30 — मल होने के पहले पेट गड़गड़ाना, पेट में दर्द, पेशाब करते समय पल का निकल जाना, आवाज के साथ मल निकलना।

आर्सेनिक 6, 30 — बहुत ठंडी कोई खाने-पीने की चीज खा-पी जाने से पेट में दर्द, पतले दस्त के साथ कभी-कभी दर्द रहता है, कभी नहीं भी रहता; रोग के उपसर्ग आधी रात के बाद बढ़ते हों, एकाएक सुस्त हो जाना, प्यास की अधिकता, पतले दस्त या अतिसार होने पर इस औषधि से उपकार होता है।

ऐसिड बेंजोयिक 200 — साबुन के फेन की तरह फेन मिला सफेद रंग का बदबूदार दस्त, पेशाब में बदबू, बच्चा हो तो बहुत चिड़चिड़ापन, दिन भर स्तन-पान करना और माता से चिमटा रहना चाहता है।

ब्रायोनिया 6, 30 — गर्मी के बाद एकाएक सर्दी पड़ जाने के कारण या एकाएक ऋतु परिवर्तन होकर और नाना प्रकार के फल-मूल खाकर, विशेषकर खट्टे फल खाने के कारण यदि पतले दस्त आने लगे और उसके साथ ही इसके चरित्रगत लक्षणहिलने-डुलने पर और सवेरे समय रोग की वृद्धि होने तथा अतिसार के साथ पेट में दर्द रहने पर इस औषध का प्रयोग होता है।

कैल्केरिया कार्ब 30, 200 — बच्चों को दांत निकलने के समय वमन होने पर, इसके रोग-लक्षण तीसरे पहर और संध्या के समय बढ़ते हैं।

कैमोमिला 30 — छोटे-छोटे बच्चों के पेट में दर्द के साथ पतले दस्त; बच्चा हाथ-पैर पटकता है और ऊपर की तरफ खींचता है; पेट कड़ा और अफारा, हरे रंग के आंव मिले दस्त, अजीर्ण, अंडे की सफेदी की तरह बदबूदार दस्त, पेट गड़गड़ाना, मलद्वार की खाल गल जाना, कामला।

चायना 6, 30 — दस्त के साथ फेन, पेट में प्रायः दर्द नहीं रहता, खाने-पीने के बाद रात के समय दर्द बढ़ जाता है।

कोलिंसोनिया 3, 6 — बच्चों का उदरामय, पेट की गड़बड़ी, पेट में शूल की तरह खोंचा मारने की तरह दर्द, ऐंठन, मरोड़ और अफारा।।

कोलोसिंथ 6, 30 — दस्त के साथ आंव-रक्त सो पित्त, कभी-कभी केवल रक्त के दस्त आते हैं, मलद्वार की त्वचा गल जाती है, मल के समय पेट में बहुत अधिक दर्द और कराहना, वमन, दस्त के साथ पेटदर्द घट जाता है, लेकिन यदि बढ़ जाता है, तो बहुत कष्ट होता है और अधिक समय तक बना रहता है। दबाने से दर्द घटता है।

क्रोटोन 3 — एकाएक पीले रंग का पानी की तरह दस्त पिचकारी की तरह छूट निकलता है, मल होने के पहले पेट में भयंकर दर्द होता है।

फेरम मेट 6, 30 —-बहुत अधिक परिमाण में पानी की तरह पतले दस्त, पेट में दर्द नहीं रहता, अतिसार के साथ अच्छी भूख।

इपिकाक 30, 200 — दांत निकलने के समय दस्त, वमन, चर्बी मिले और मीठे पदार्थ तथा खट्टे फल-मूल आदि खाकर रोग की उत्पत्ति; पेट में दर्द, चेहरा उतरा हुआ, शरीर ठंडा।

आइरिस वर्स 6 — पेट में, मलांत्र में और मलद्वार में जलन, हरे रंग के दस्त, नित्य प्रातः एक ही समय, विशेषकर रात में 3 और 4 बजे के बीच; अतिसार का बढ़ना।।

जैट्रोफा 30 — पानी की तरह पतले दस्त, बिना किसी तरह के दर्द के अतिसार, सवेरे के समय दस्त की अधिकता, मल होने के पहले पेट में गड़गड़ाहट और साथ ही मल-त्याग की हाजत, गड़गड़ाहट के साथ दस्त का होना।

लेप्टैण्ड्रा 3, 6 — जलकतरे की तरह काले रंग के दस्त या बहुत अधिक परिमाण में पानी की तरह दस्त, उसके साथ ही छोटी आंत में असह्य दर्द, बरसात में यह पानी में भीगकर रोग पैदा हुआ हो, तो भी यह औषधि लाभ करती है।

मैग्नेशियो कार्ब 6, 30 — मल का रंग गहरा हरा, कभी-कभी उसके साथ फेन मिला रहता है और अंडे जैसा सफेद पदार्थ उस पर तैरा करता है; तालाब की काई की तरह दस्त, मल होने के पहले पेटदर्द, मल होने के बाद यह दर्द बंद हो जाता है।

मर्क्युरियस सोल 6 — मल होने के पहले या बाद में तेज पेटदर्द, ज्यादा कूथन, आंव, रक्त और हरे रंग के दस्त, संध्या या रात्रि में उपसर्गों का बढ़ना, पीलिया।

नक्सवोमिका 3, 6 — सवेरे के समय उपसर्ग बढ़ते हैं। जो लोग अधिक मात्रा में मदिरा, गांजा, अफीम, चरस या तंबाकू-जर्दे का सेवन करते हैं, उनके रोग में यह औषधि लाभ करती है।

पोडोफाइलम 30 — अतिसार में दस्त का परिमाण बहुत अधिक रहता है और सवेरे से बढ़ जाता है। दस्त धीरे-धीरे घटकर संध्या के बाद एकदम बंद हो जाते हैं, मल में बहुत संड़ी बदबू रहती है; दस्त पल्सेटिला की तरह परिवर्तनशील अर्थात एक बार सफेद, एक बार पीला, फिर हरा, इस तरह होता है।

पल्सेटिसा 30 — जाड़ा-सा मालूम होता है, प्यास बिल्कुल नहीं रहती, मुंह का स्वाद एकदम तीता रहता है, जिह्वा पर गाढ़ा लेप-सा चढ़ा रहता है। रात के समय पतले दस्त ज्यादा आते हैं, पाकस्थली की क्रिया की गड़बड़ी, मिचली।।

रस-टॉक्स 6, 30 — मल होने के पहले तीव्र पेटदर्द, हरे दस्त और उसके साथ मांड की तरह पदार्थ रहता है। रात में और स्थिर रहने पर अतिसार बढ़ जाता है।

सल्फर 6, 30 — बहुत समय पेटदर्द नहीं रहता या खूब दर्द और कूथन रहती है। सयेरे रोग के लक्षण बढ़ जाते हैं, मल के वेग से नींद खुल जाती है। मलद्वार की त्वचा छिल जाती है।

वेरेट्रम एल्बम 30 — रोग रात्रि में एकाएक उत्पन्न हो जाता है, पेट में शूल की तरह दर्द होता है। गरम दिनों का रोग; दस्त के साथ वमन, दस्त का रंग सफेद, तेज प्यास, पानी पीने के बाद उपसर्गों की वृद्धि।

नोट — हैजा, अतिसार और आमाशय में जिन सी औषधियों का प्रयोग होता है, इस रोग में भी ठीक वे ही औषधियां प्रयोग की जाती हैं, अंतर केवल कुछ औषध-शक्तियों को होता है।

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