कब्ज का होम्योपैथिक इलाज [ Homeopathic Medicine For Constipation ]

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कब्ज किसे कहते हैं? हम लोग नित्य जो खाते हैं, उसका सार अंश रक्त और असार अंश मल में परिणत होकर रोज निकल जाता है, यही स्वाभाविक नियम है। जब ऐसा न होकर वही मल बहुत दिनों तक आंतों में रुका रह जाए, रोज निकल न जाए या कष्ट से निकलता हो, तो उसे कब्ज या कोष्ठबद्धता कहते हैं। कब्ज निम्न कारणों से होता है-

(1) नित्य अधिक परिमाण में गरिष्ठ चीजें खाने पर और जिनमें जलीय अंश कम होता है, ऐसे सूखे पदार्थ – जैसे मोटी रोटी इत्यादि रोज खाने पर मल सूख जाता है और कष्ट से निकलता है, इससे कब्ज होता है।

(2) गरम और मसाले वाली चीजों में पानी का अंश कम रहता है, अतः ऐसी चीजें और नित्य मांसादि खाने से कब्ज होता है।

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(3) उपवास करने अथवा किसी एक ही तरह की चीज रोज खाने से और केवल गाय का दूध पीकर रहने से भी कब्ज रहता है।

(4) पाखाना लगने पर ठीक उसी समय न जाकर असमय में जाया जाय, तो कुछ दिन बाद कब्ज हो जाता है (बवासीर के रोगी कष्ट से बचने के लिए ऐसा किया करते हैं)।

(5) बहुत दिनों तक पतले दस्त आने के बाद अथवा जुलाब लेने का अभ्यास होने पर कब्ज होता है। रक्ताल्पता (एनीमिया), हरित्पाण्डु-रोग (क्लोरोसिस), पक्षाघात आदि रोगों में आंतों की पेशी कमजोर पड़ जाती है, उससे तथा बहुत अधिक मानसिक परिश्रम करने और शारीरिक परिश्रम न करने पर, बहुत पसीना और बहुमूत्र आदि रोगों में अधिक मात्रा में पेशाब होने के कारण फेफड़े के किसी रोग में बहुत अधिक श्लेष्मा निकलने से तथा मस्तिष्क और मेरुमज्जा के रोग इत्यादि में कब्ज होता है।

(6) आंतों में बहुत थोड़ा पाचक रस निकलने और पित्त-कोष से बहुत थोड़ा पित्त निकलने पर कब्ज होता है।

आंतों के भीतर बहुत दिनों तक मल अड़ा रहने से वह सड़ना आरंभ हो जाता है, जिस कारण एक प्रकार का विषैला पदार्थ उत्पन्न होकर रक्त में मिल जाता है, इस कारण सिरदर्द, आँखों में ऐसा दिखाई देना मानो सामने कुछ उड़ रहा है, पाचन-शक्ति का नाश, अरुचि, भूख न लगना, मुंह बेस्वाद, जिह्वा मैली, पेट तना, कलेजे में धड़कन, चिड़चिड़ा मिजाज, रक्तहीनता, नींद न आना, ज्वर इत्यादि का सामना व्यक्ति को करना पड़ता है। यदि मल बहुत दिनों तक आंतों में पड़ा रहे, तो आंत की पेशी की वृद्धि, आंत के भीतर का आयतन बढ़ जाना और सूखा मल जमा रहता है, तो आंतों का प्रदाह, आंतों का घाव और बहुधा आंतों में छिद्र हो जाता है। आंतों में मल अड़ा रहने से बवासीर होती है, वीर्यक्षय होता है, पैर का तलवा फूलता है और स्नायविक-दर्द और शियाटिका हो जाता है।

कब्ज के कष्ट से छुटकारा पाने के लिए बहुत से अनजान लोग प्रायः जुलाब लिया करते हैं, उससे पहले तो सामयिक लाभ हो जाता है, पर अंत में कुछ भी लाभ नहीं होता, रोगी क्रमशः जुलाब की मात्रा और परिमाण बढ़ाता जाता है, किंतु उससे लाभ के स्थान पर हानि ही अधिक होती है। जिस दिन जुलाब लिया जाता है, उस दिन किसी तरह दो-चार बार दस्त हो जाता है, लेकिन दूसरे दिन से और भी अधिक कब्ज के लक्षण प्रकट होने लगते हैं, इसलिए यह क्रिया बंद कर देनी चाहिए।

जिन्हें बहुत अधिक कब्ज रहता है, जिनको प्रायः जुलाब लेना पड़ता है, औषधियों से स्थायी लाभ नहीं होता, वे बड़ी हरड़, सोंठ-सनाय की पत्ती और सौंफ ये कई चीजें अलग-अलग कूटकर, कपड़छन करके सबको समान वजन में मिलाकर एक शीशी में भर कर रखें और नित्य भोजन के बाद आधा चम्मच की मात्रा में पानी के साथ सेवन करें। अथवा-छिलका उतारा तिल, मक्खन, ताल मिश्री-सबको एक साथ पीसकर नित्य सवेरे खाने से कोठा साफ होता है। इससे पेट ठंडा रहता है और पौष्टिक भी है। इसके अलावा गुलाब की सूखी कली 2 तोला, मिश्री 4 तोला को एक साथ अच्छी तरह पीसकर एक पाव गरम दूध के साथ लेने से दस्त होकर पेट साफ हो जाता है। यह यूनानी गुलकंद का जुलाब है।

कब्ज के रोग में जब औषधियों के सेवन से लाभ नहीं होता, उस समय नित्य नियमित रूप से कुछ समय के लिए कुछ दिनों तक व्यायाम करने से विशेष लाभ होता है। बहुत अधिक पढ़ना-लिखना, एक ही ढंग से बहुत देर तक बैठे रहकर काम करना मना है। रोज सुबह-शाम घूमना लाभ करता है।

आहार – सवेरे भात, तीसरे पहर फल, रात में चक्की के पिसे आटे की रोटी। भात खूब सिझाकर और नरम बनाकर अच्छी तरह चबा-चबाकर खाना चाहिए। फल-ताजे और पके ही लाभ करते हैं। पका पपीता, केला, आम, जामुन, बेल, अंगूर, नाशपाती, सेब, मेहताबी नींबू, संतरे, खजूर और अमरूद इच्छापूर्ण खाये जा सकते हैं। इनमें अमरूद सबसे ज्यादा दस्तावर है, पर अमरूद खाने के समय उसके बीजों को साबुत ही निगलना चाहिए। तरकारियों में साग-सब्जी उपकारी और विरेचक हैं। इसलिए बथुआ, पालक, कलमी, परवल के पत्ते आदि नित्य एकेक सागा खाना चाहिए। केले का गामा, केले का फूल, गूलर, कच्चू और ओल भी लाभ करते हैं। मूंग की दाल खाना मना नहीं है। मछली-मांस हानि करते हैं, विशेष इच्छा हो तो मछली सप्ताह में केवल एक बार खाई जा सकती है। तीसरे पहर रोटी के साथ थोड़ा गुड़ खाना चाहिए।

डॉ० जहार का कथन है कि होम्योपैथिक चिकित्सकों के लिए कब्ज का उपचार करना बहुत ही कठिन कार्य है। यदि किसी रोगी को एक सप्ताह तक मल न हो, एनीमा या पिचकारी देकर भी कोई लाभ न हो, तो ऐसे रोगी के लिए वे पहले ओपियम प्रयोग करते थे। यदि 24 घंटों में ओपियम से कोई लाभ नहीं होता, तो उसके बाद प्लम्बम 30 या एल्यूमिना का प्रयोग करते थे। चेष्टा करने पर बहुत थोड़ा मल निकलने का लक्षण रहने पर प्लैटिना और जिन व्यक्तियों को बवासीर का रोग है, उनके उक्त लक्षण में नक्सवोमिका या सल्फर लाभ करती है। पाकस्थली में बहुत अधिक दबाव मालूम होना, मल बहुत कड़ा होना, इन दोनों लक्षणों में लैकेसिस देनी चाहिए।

गर्मी के दिनों के कब्ज में ब्रायोनिया, लाभ न हो, तो कार्बोवेज या एण्टिम क्रूड, सर्दी के दिनों के कब्ज में वेरेट्रम एल्बम, जो बैठे-बैठ काम किया करते हैं, शारीरिक परिश्रम नहीं करते, उनकी कब्जियत में नक्सवोमिका, ब्रायोनिया या काक्युलस, जो बच्चे घुटनों के बल चलते हैं, चलना नहीं सीख पाए हैं, उनकी कब्जियत में नक्सवोमिका, ब्रायोनिया, गर्भवती स्त्रियों की कब्जियत में सिपिया, नक्सवोमिका, ब्रायोनिया, ऐल्यूमिना, प्रसूता स्त्री के कब्ज में प्लैटिना, ओपियम, गाड़ी में घूमने से या पैदल चलने से कब्ज होने पर ऐल्यूमिना, प्लैटिना, वृद्धों के कब्ज में एण्टिम क्रूड, फासफोरस, ब्रायोनिया, लैकेसिस, शराबियों के कब्ज में नक्सवोमिका, कैल्केरिया, सल्फर और लैकेसिस उपयोगी है।

पानी का एनीमा – डॉ० हेरिंग का कथन है कि जिन लोगों को अधिक समय से कब्ज की शिकायत है, वे यदि रात को सोते समय ठंडे पानी का एनीमा लेते रहें, तो दो-एक सप्ताह में ही आंतें ठीक काम करने लगती हैं और कब्ज की शिकायत दूर हो जाती है। कभी-कभी कब्ज किसी अन्य रोग के साथ जुड़ा होता है। यदि उस रोग का उपचार हो, तो कब्ज अपने आप दूर हो जाता है। उदाहरण के लिए, हृदय-रोग में स्पाइजेलिया, माइग्रेन में आइरिस तथा सिरदर्द में जेल्सीमियम के लक्षण पाए जाते हैं। इन रोगों का उपचार करते हुए यदि कब्ज हो, तो हृदय-रोग में स्पाइजेलिया से, माइग्रेन में आइरिस से और सिरदर्द में जेल्सीमियम से हृदय-रोग, माइग्रेन और सिरदर्द ही नहीं जाएगा, कब्ज भी जाता रहेगा।

हाइड्रेस्टिस 2x, 30 – यह औषधि नक्सवोमिका से भी अच्छा काम करती है। प्रातः काल का जलपान से पहले इसके मूल-अर्क की 1 बूंद कई दिनों तक लेते रहने से कब्ज में लाभ होता है। अधिकतर होम्योपैथ कब्ज में नक्सवोमिका दिया करते हैं। यदि रोगी को केवल कब्ज की ही शिकायत हो, तब हाइड्रेस्टिस सर्वोत्तम औषधि है। उनके कथनानुसार 2x शक्ति में भी यह बहुत अच्छा काम करती है। कब्ज और दस्त के पर्यायक्रम में भी यह उपयुक्त है। प्रायः दस्तावर औषधियों के लेने के बाद कब्ज की शिकायत हो जाती है, तब यह तथा नक्सवोमिका उपयोगी होती हैं। हाइड्रेस्टिस के कब्ज में पेट अंदर को धंसता-सा अनुभव होता है जो लक्षण नक्सवोमिका में नहीं है।

नक्सवोमिका 200, 1M – जब मल-निष्काशन के लिए बार-बार जाना पड़े, किंतु हर बार पेट साफ न हो और पुनः जाना पड़े, तो इसे नक्सवोमिका का लक्षण नहीं समझना चाहिए, क्योंकि यह लक्षण लाइकोपोडियम में भी पाया जाता है, किंतु इन दोनों के कब्ज में भेद यह है कि नक्सवोमिका में आंतों की अनियमित-गति के कारण कब्ज होता है और लाइकोपोडियम में गुदा की संकोचक-पेशी के कारण कब्ज होता है; रोगी को ऐसा लगता है कि गुदा में डाट लग गया है, वहां का मल को बाहर नहीं निकलने देता। डॉ० कार्टियर का कहना है कि कब्ज दूर करने के लिए नक्सवोमिका को निम्न शक्ति में नहीं देना चाहिए, न ही बार-बार देना चाहिए।

एलू-3 – यह औषधि एलूमिना से उल्टी है। हर समय हाजत बनी रहती है, अनजाने में सख्त मल भी निकल पड़ता है।

सीपिया 30, 200 – मल निकलने के बाद भी गुदा में डाट-सी लगी महसूस होती है। ध्यान रहे, इसके कब्जे में कोई न कोई जरायु-संबंधी रोग शामिल रहता है, इसलिए यह औषध प्रायः स्त्रियों के कब्ज में हितकर है।

ग्रैफाइटिस 30, 200 – स्त्रियों में ऋतु-धर्म के विलम्ब से होने के साथ ऐसा मल, जिस पर आंव चिपटी रहे, कठिनाई से निकले, कई दिन मल न आए, तब यह औषध देनी चाहिए। सख्त मल आने से गुदा में चीर पड़ जाता है, जिससे मल आने में बहुत तकलीफ होती है। इस प्रकार के चीर में नाइट्रिक एसिड भी उपयोगी है।

मैग्नेशिया म्यूर 30 – बच्चों के दांत निकलते समय के कब्ज में यह औषधि हितकर है।

सल्फर 30 – इस औषधि में नक्सवोमिका और लाइकोपोडियम की तरह पेट पूरी तरह से साफ नहीं होता। यों इसमें कई अन्य लक्षण भी पाए जाते हैं, जैसे कि रोगी को कोई त्वचा का रोग हो, खाज, छाले, फुसियां हों, बेहोशी के दौरे पड़ते हों, सिर की तरफ गर्मी की झलें उठती हों, 11 बजे जी डूबता-सा लगता हो, कमजोरी का अनुभव होता हो, तो सल्फर उपयोगी है। नक्सवोमिका से लाभ न हो, तो सल्फर उसकी कमी को पूरा कर देती है। बहुत से होम्योपैथ कब्ज की चिकित्सा सल्फर से प्रारंभ करते हैं।

मर्क डलसिस 1x – बोरिक का कथन है कि मल न आ रहा हो, किसी भी प्रकार उसे लाना हो, तो इस औषधि का 1.x विचूर्ण 2 से 3 ग्रेन की मात्रा में हर घंटे देते रहने से पेट खुलकर साफ हो जाता है।

ब्रायोनिया 30, 200 – आंतें काम न करती हों, मल खुश्क आता हो, लंबा, सख्त, सूखा हुआ, अंतड़ियों का स्राव न बनता हो, इसी सूखेपन के कारण बहुत प्यास लगी हो। ब्रायोनिया का रोगी सूर्य की गर्मी को बर्दाश्त नहीं कर सकता।

ओपियम 30, 200 – इसमें भी ब्रायोनिया की तरह आंतें खुश्क होती हैं, वे काम नहीं करतीं, उनमें से स्राव नहीं रिसता। यही कारण है कि रोगी को मल कठोर मार्बल की तरह होता है। ब्रायोनिया, ओपियम तथा एलूमिना-इन तीनों में मल की हाजत नहीं पाई जाती। ओपियम के रोगी को कुछ औंघाई भी रहती है, किंतु मल की हाजत बिल्कुल नहीं होती।

एलूमिना 30, 200 – पाखाना जाने की इच्छा नहीं होती। कई दिन का मल जब तक जमा नहीं हो जाता, तब तक व्यक्ति मल-त्याग के लिए नहीं जाता। गुदा काम ही नहीं करती, मल-त्याग के लिए गुदा पर बहुत जोर लगाना पड़ता है। गुदा के काम न करने की हालत यहां तक होती है कि नरम मल भी आसानी से नहीं आता, उसके लिए भी बहुत जोर लगाना, कांखना पड़ता है। ओपियम, एलूमिना, प्लम्बम और ब्रायोनिया में मल बहुत सख्त होता है। सिलेनियम देने से गुदा को ताकत मिलती है, जिससे वह कार्य-सक्षम हो जाती है।

लाइकोपोडियम 30 – कब्जियत या बड़े कष्ट से सूखा, कड़ा मल थोड़ा-सा निकलना, पेट फूल जाना, पेट में गर्मी मालूम होना, पेट में आवाज होना, भोजन के बाद ही तलपेट का फूलना, पाखाना लगना, पर न होना, मुंह में पानी भर आना आदि लक्षणों में यह औषध दें।

ऐनाकार्डियम 3, 6 – पाखाने की हाजत, किंतु पाखाना निकालने की चेष्टा करते ही उसका बंद हो जाना।

कालिंसोनिया 3 – यदि कब्जियत के साथ बवासीर भी हो, तो इससे लाभ होता है।

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