क्रूप खांसी का होम्योपैथिक इलाज [ Homeopathic Medicine For Croup Cough ]

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बोलचाल की भाषा में इसे ‘काली’ या ‘सूखी खांसी’ कहते हैं। साधारणतः यह खांसी 1 वर्ष से लेकर 4-5 वर्ष तक के बच्चों को ही हुआ करती है। इससे अधिक आयु हो जाने पर प्राय: नहीं होती और होती भी है तो उतनी भयंकर नहीं होती। क्रूप दो प्रकार का होता है – कैटरैल और मेम्ब्रेनस। गलनली के भीतर एक झिल्ली (मेम्ब्रेन) अर्थात एक प्रकार का सफेद पर्दा-सा जमकर, जब समस्त श्वास-नली यहां तक कि फेफड़े तक पर आक्रमण हो जाता है और उससे श्वासरोध तथा जबरदस्त तकलीफ होती है, तब उस पीड़ा को ‘ट्रू-क्रूप’ कहते हैं और जब कोई झिल्ली या पद न जमकर केवल लसदार गोंद की तरह श्लेष्मा जमकर और थोड़ा-सा श्वासकष्ट और श्वासरोध होता है, तब उसको ‘कैटरैल क्रूप’ कहते हैं।

ट्रू-क्रूप के लक्षण – पहले बच्चे को मामूली सर्दी, खांसी, छींक तथा ज्वर (बुखार) इत्यादि लक्षण प्रकट होते हैं और गले की आवाज भी बिगड़ जाती है। सोता हुआ बच्चा एकाएक घबराकर (जैसे उसकी सांस रुक गई हो) उठ बैठता है, गले में एक तरह की विचित्र सांय-सांय की आवाज होती है और खांसी शुरू हो जाती है। खांसी की आवाज ऐसी होती है जैसे किसी धातु के बर्तन पर चोट देने से होती है तथा कभी-कभी कुत्ता भौंकने जैसी आवाज होती है। बच्चा बड़े कष्ट से खांसता है। सारे शरीर से पसीना आने लगता है। नाक ऊंची करके जोर से श्वास खींचता है, बच्चा कमजोर और सुस्त हो जाता है।

नाड़ी की गति मंद हो जाती है, आंखें धंस जाती हैं। इस रोग में कभी-कभी चार-पांच दिनों में ही बच्चे की मृत्यु हो जाती है और किसी-किसी को आराम होने में 15-20 दिन का समय लग जाता है। कैटरैल क्रूप के लक्षण प्राय: उपर्युक्त ट्रू-क्रूप के लक्षण के समान होते हैं, किंतु इसमें सहज की बच्चा आरोग्य हो जाता है। इसमें खांसी के साथ लसदार कफ निकलता है, गले में ‘घड़-घड़’ शब्द होता है। कभी-कभी हूपिंग-कफ के साथ इस रोग का भ्रम हो जाता है।

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डॉ० डनहम के अनुभव के अनुसार रुमेक्स 3, 6 – से इस रोग में आराम होता है। यदि खांसी वायु-नली से उठे, तो फास्फोरस-30 से लाभ होता है।

एकोनाइट 3x, 30 – डॉ० ज्हार लिखते हैं कि क्रूप खांसी की मुख्य औषधि यही है। यदि तंग करने वाली खांसी के साथ बैचेनी और परेशानी के साथ ज्वर भी आ जाए, तो एकोनाइट को 3x की शक्ति में आधे-आधे घण्टे के अंतराल पर दिया जा सकता है। लाभ आरंभ होने पर समय बढ़ा देना चाहिए।

स्पंजिया 3 – यदि एकोनाइट देने के 6 घण्टे में लाभ न हो और ऐसा जान पड़े कि रोगी को काली खांसी है, गला बैठ गया है, बोली नहीं निकलता, तो इस औषधि का आधे-आधे घण्टे में प्रयोग करना चाहिए। लाभ आरंभ होने पर औषध बंद कर देनी चाहिए।

कैलि बाईक्रोम 3x, 30, 200 – यदि गाढ़ा सूतदार, गोंद सरीखा पीला कफ निकले, जिसका निकलना ही कठिन हो, तो 3x या 3 शक्ति की यह औषध आधे-आधे घंटे के बाद या 30 शक्ति की औषध को दो-तीन मात्राएं दिन में एक बार देनी चाहिए।

हिपर सल्फर 3 – जब कफ ढीला पड़ जाए, किंतु गले में ही पड़ा रहे, तब इसे प्रति 2 घंटे में देने से लाभ होता है।

कॉस्टिकम 3, 30 – पुरानी खांसी, गले से आवाज न निकले, गले की नसें कमजोर हो जाएं, कफ गाढ़ा हो, खांसते-खांसते मूत्र निकल जाए, तब यह औषध देनी चाहिए।

एण्टिम टार्ट 6 – घड़-घड़ करता ढीला कफ, जीभ दूध के लेप जैसी सफेद, हर 3 घण्टे बाद यह औषध दें।

फास्फोरस 30 – गले में खराश, सूखी खांसी, गला खून की कमी से पीला पड़ जाए, गहरा खांसना पड़ता है, तो दें।

मैंगेनम 3, 30 – स्वर-यंत्र खुश्क, खुरदुरा, सिकुड़ा-सा, गले में से कफ निकालना कठिन हो जाता है, गले में ऐसी चुभन जो कान तक पहुंचती है।

कार्बोवेज 6, 30 – पुरानी खांसी, ऐसी खांसी जो जुकाम से शुरू हो और अंत में जाकर स्वर यंत्र तथा छाती में जा बैठे।

लैकेसिस 30 – गला तनिक-सा भी स्पर्श सहन न कर सके, द्रव पदार्थ या सैलाइवा निगलना भी कठिन हो जाए, गले के बाएं भाग में टांसिल हो जाए, गर्म पदार्थ पीने से कष्ट हो, इन लक्षणों में तथा एकोनाइट, स्पांजिया, हिपर सल्फर देने से खांसी में लाभ न हो, तब यह औषध देना आवश्यक हो जाता है।

आर्स आयोडाइड 3x – 2 ग्रेन प्रति 8 घंटे – स्तर-यंत्र के पुराने रोगियों की खांसी में भोजन के तुरन्त बाद कुछ दिन तक यह औषध देनी चाहिए।

बैसीलीनम 200, 1M – पुरानी तथा अन्य प्रकार की सभी खांसियों में इस औषध की 10-15 बूंद पन्द्रह दिन में एक बार देनी चाहिए। लाभ शुरू होने पर तत्काल औषध देना बंद कर दें।

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