अतिसार या उदरामय का होम्योपैथिक इलाज [ Homeopathic Medicine For Diarrhoea ]

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इस रोग के बारे में संभवतः कुछ अधिक और नए ढंग से बताने की आवश्यकता न होगी, क्योंकि इसके लक्षण के बारे में प्रायः सभी अवगत होते हैं। इस रोग में पहले पतला मल कभी थोड़ा और कभी अधिक बार-बार निकलता रहे, तो उसे अतिसार अथवा डायरिया कहते हैं। बहुत अधिक खाने-पीने, गरिष्ठ और उत्तेजक पदार्थ खाने तथा बासी और सड़ी-गली चीज खाने-पीने के कारणों से यह रोग होता है। व्यक्ति जो कुछ खाता है, उसका कोई अंश या थोड़ा-सा अंश न पचकर अजीर्णवस्था में मल के साथ निकलता है। धूप में घूमने, अग्नि की तपिश और परिश्रम इत्यादि से शरीर गरम हो जाने पर उसी समय एकाएक शर्बत, बरफ का ठंडा पानी पीने आदि से अकस्मात पेट में किसी तरह सर्दी लग जाने पर अथवा पसीना बंद होने पर अतिसार होता है। गर्मी के दिनों में जब बहुत ज्यादा गर्मी पड़ती है, तब अतिसार हो जाता है।

यकृत की क्रिया अच्छी न होने तथा ऋतु-परिवर्तन, जुलाब लेना, आंतों में कृमि,। शोक, दुख, भय इत्यादि कारणों से भी अतिसार हो जाया करता है। अजीर्ण के कारण जल्दी-जल्दी पतले दस्त होते हों, तो पेटदर्द, पेट में मरोड़, पेट गड़गड़ाना, डकार, खट्टी इकार, पेट फूलना, सीने में जलन आदि उपसर्ग रहते हैं। मल को रंग पीला, हरा, सफेद आदि कई तरह का होता है। मल में खट्टी गंध या सड़ी बदबू रती है। हर बार मल त्याग के समय पेशाब होता है। अम्ल के कारण यदि पतले दस्त होते हों, तो उदरामय के साथ खट्टी डकार, खट्टा वमन, सीने और गले में जलन होती है, मुंह का स्वाद खराब रहता है।

जब बच्चों को अतिसार हो जाता है, तो उसके साथ प्रायः पेट फूलना, पेट में मरोड़ का दर्द, कुथन, रोना-ये सब लक्षण रहते हैं। बच्चा पैर पटकता है, पैर पेट की। तरफ मोड़ रखता है, बेचैन रहता है; मल का रंग हरा, पीला, काला और छेने के टुकड़े की तरह, उसमें फटा-फटा सफेद पदार्थ मिला रहता है; कुछ मल, कुछ पानी, दूध /. निकलना इत्यादि नाना प्रकार के दस्त होते हैं। कभी-कभी रक्त मिले दस्त आते हैं। अतिसार के साथ कभी-कभी ज्वर रहता है, बच्चा हमेशा रोता हैं, कमजोर हो जाता है।

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साधारण अतिसार में और अतिसार के साथ कोई विशेष उपसर्ग न रहे, तोः।। रोग भोगने के समय पानी में बना हुआ साबूदाना, पानी में बनी बार्ली, पानी कम आरारोट, सिंघाड़े की लस्सी, जौ का मांड, संतरे और बिदाने का रस आदि पतली चीजें पीने और औषध सेवन के सिवा कोई भी दूसरी व्यवस्था की आवश्यकता नहीं रहती।

कोलोसिंथ 6, 30 — दस्तों की बार-बार हाजत, किंतु इसके दस्तों में नाभि के आस-पास सख्त दर्द होता है, पेट फूल जाता है और रोगी दर्द के कारण दोहरा हो जाता है, पेट दबाने से उसे आराम मिलता हैं।

कैम्फर (मूल अर्क) — साधारण दस्त आने पर इसकी कुछ बूंद बताशे या शक्कर में डालकर पन्द्रह-पन्द्रह मिनट बाद लेने से प्रायः लाभ होता है। इसे होम्योपैथिक औषधियों से अलग, दूर रखना चाहिए, क्योंकि यह उनके प्रभाव को नष्ट कर देती है।

क्यूप्रम 6, 30 — दस्तों के साथ ऐंठन होना। इस औषधि के दस्तों में तीव्रता, कठोरता रहती है। तीव्र-वेदना होती है, पेट पर एक प्रकार का बोझ-सा पड़ता है। पेट की पेशियों में ऐंठन होती है, खींच पड़ती हैं। दस्तों के साथ पेट में, उंगलियों में, पिंडली में और पांवों में कष्ट की अनुभूति होती है तथा खींच-सी पड़ती है। यह खींच हाथ तथा पांवों की उंगलियों व अंगूठों से शुरू होती है। महात्मा हैनीमैन ने जा के देस्तों में कैम्फर, क्यूप्रम तथा वेरेट्रम एल्बम-इन औषधियों को मुख्य बतलाया है।

चायना 30 — दर्द-रहित दस्त, पेट में वायु का प्रकोप (कार्बोवेज, लाइकोपोडियम, कोलचिकम); पेट की वायु में डकार आने से भी राहत महसूस नहीं होती, कार्बोवेज में इससे उल्टा है, दस्त पनीले होते हैं, पीले या भूरे, नितांत बदबूदार, उनमें गैस बहुत निकलती है। दस्तों में अपच भोजन निकलता है, रोगी इन दस्ती से बहुत कमजोर हो जाता है। होम्योपैथी में डायरिया के लिए यह सवौत्तम औषधि हैं।

ब्रायोनिया 30, 200 — प्रातःकाल का डायरिया; हरकत से दस्त आ जाता है, रोगी बिना हिले-डुले पड़ा रहता है। चूंकि रोगी रात भर आराम से पड़ा रहता है, इसलिए रात को दस्त नहीं आता, किंतु सवेरे उठकर चलने-फिरने लगता है, इसलिए हरकत से दस्त आ जाता है। इसी कारण यह औषधि प्रातःकाल के दस्तों के लिए उपयुक्त है, क्योंकि प्रातःकाल रोगी हरकत करने लगता है। वैसे तो यह औषधि कब्ज के लिए प्रसिद्ध है, किंतु दस्तों में भी यह तब दी जाती है, जब फलों या साग-सब्जी की वजह से दस्त आने लगें। अधिक गर्मी लगने से दस्त आने पर भी औषधि लाभप्रद है। कभी-कभी दस्त काले, हरे होते हैं, वयोंकि उनमें पित्त मिला होता है, दस्त लसदार होते हैं, जिसमें सड़े पनीर की-सी बदबू आती है।

सायनोडोन हैक्टाइलोन 6x — हिंदी में इसे दूब तथा संस्कृत में दूर्वा कहते हैं। एक प्रसिद्ध होम्योपैथ ने इस औषधि की परीक्षासिद्धि एक महिला पर की और परिणामस्वरूप उस मंहिला के दस्त तथा पेचिश में इस औषधि ने बत लाभ किया। इसमें लाइकोपोडियम, एलो तथा पोडोफाइलमे के लक्षण एक साथ पाए गए हैं। बदबूदार अपानवायु निकलती है, कठिन मल, आध्मानयुक्त गड़गड़ाहट का शब्द, 4 बजे सायंकाल पेट में वायु भर जाना आदि इसके लक्षण हैं। जब निश्चय न हो सके कि उक्त तीनों औषधियों में से कौन-सी दी जाए, तब इस औषधि को देने से बहुत लाभ होता है, रोगी को आराम हो जाता है।

वेरेट्रम एल्बम 30 — इस औषधि के दस्तों का मुख्य लक्षण है-ठंडा पसीना, बड़े-बड़े दस्त और माथे पर ठंडा पसीना, डॉ० हैनीमैन ने हैजे के लिए जिन तीन औषधियों की तरफ निर्देश किया है, उनमें से यह एक है। हैजे में इसके लक्षण हैंबेहद उल्टी तथा दस्त, बेहद ठंडा पसीना, दस्तों के साथ बेहद कमजोरी। दस्तों के साथ कमजोरी में ऐसा लगता है कि रोगी डूबता जा रहा है, शरीर ठंडा, शरीर से निकलने वाले स्राव ठंडे, ऐसा लगता है कि नाड़ियों में रक्त नहीं बरफ का पानी भरा है। सिर से पांव तक ठिठुरन, कंपकंपी दौड़ जाती है। पेट में वायु अटक जाती है, जितनी देर अटकी रहती है, उतने समय में ऐसा लगता है कि यह अब न निकलेगी। हाथ-पांव ऐसे ठंडे हो जाते हैं जैसे मृत्यु की ठंडक हो, ऐसा लगता है कि रोगी अब मरा, अब मरा। ऊपर पेट से जबरदस्त उल्टी और नीचे आंतों से जबरदस्त दस्तऐसी हालत होती है इस औषधि में। भय आदि उद्वेगों से दस्त आ जाते हैं, किंतु इस दशा में यह औषधि तभी ठीक होगी, जब ठंडा पसीना साथ होगा।

आर्सेनिक एल्बम 30, 200 — बरफ खाने के बाद दस्त आ जाना या जब शरीर गरम हो, तब बरफ का-सा ठंडा पानी पी लेने के कारण दस्त आ जाना। सड़े हुए मांस या फलों के कारण यदि दस्त आने लगें, तब भी यह उपयोगी है। इसमें भी लगातार दस्त आते हैं, उल्टियां आती हैं, प्रयः उल्टी तथा दस्त एक साथ आने लगते हैं, इसलिए हैजे के लिए भी यह उपयोगी है। जिह्वा सूख जाती है, काली भी पड़ जाती है, दस्त पीले व नीले होते हैं, रक्त मिले, अत्यंत बदबूदार। मध्यरात्रि को कष्ट बढ़ जाता है। बेरेटम तथा आर्सेनिक की तुलना निम्न है

वेरेटूम — बहुत बड़े-बड़े दस्त; बेचैनी, परेशानी, असह्य नहीं; ठंडे पानी की बेहद प्यास; दस्त आने के बाद बहुत कमजोरी, किंतु ऐसी जो इतने बड़े दस्त में होनी ही चाहिए; शरीर पर ठंडा पसीना-यह इसका विशेष लक्षण है।

आर्सेनिक — थोड़ी-थोड़ी मात्रा के दस्त; बेचैनी, परेशानी, असह्य दर्द; थोड़े-थोड़े चूंट-घूट पानी की बेहद प्यास; दस्त आने के बाद बेहद कमजोरी, किंतु ऐसी जो इतने थोड़े-थोड़े दस्तों में नहीं होनी चाहिए; दस्त के साथ गुदा में जलन-यह इसका विशेष लक्षण है।

कार्बोवेज 30, 200 — भोजन की खराबी से दस्त (आर्स में भी यह लक्षण है), किंतु इसके दस्तों में पेट में वायु का प्रकोप आर्स से अधिक होता है। चायना तथा लाइको में डकार लेने से रोगी को आराम नहीं आता है। कार्बोवेज में डकार लेने से रोगी को आराम नहीं होता है। कार्बोवेज का मुख्य-लक्षण ही पेट में वायु का प्रबल रूप में इकट्ठा हो जाना है, खाया-पिया सब गैस बन जाता है। इस औषधि में डकार लेने से सिर के दर्द तथा गठिया की औषध में भी आराम आता है।

पोडोफाइलम 6, 30, 200 — इसके पनीले, दर्द से आने वाले दस्तों की विशेषता यह है कि ये प्रातः 3 बजे से शुरू होते हैं, दोपहर तक रहते हैं, उसके बाद बंधा मल आ जाता है। इसके दस्त केवल सवेरे आते है, बदबूदार, गैस अधिक, दर्द बहुत। यदि दस्त की शिकायत सवेरे ज्यादा हो और दस्त एक धार की तरह आए, तो पोड़ो और सल्फर पर ही ध्यान जाता है। इसके दस्तों में अपच-भोजन भी निकल सकता है। खाने के साथ ही मल आ जाता है। दस्त गड़गड़ाहट के साथ आता है और इतना भारी होता है कि रोगी समझता है कि पेट का सब पानी नल के खुलने से पानी की तरह बह गया और भीतर कुछ नहीं रहा, किंतु कुछ देर बाद फिर उतना ही भारी दस्त आ जाता है। दस्त आने से पहले पेट में गड़गड़ाहट और फिर बिना दर्द के बदबूदार दस्त आना इस औषधि का सूचक लक्षण है। दस्त तथा कब्ज का पर्याय-क्रम इसमें पाया जाता है।

ऐलू 6, 30 — ख़ाना खाने या पानी पीने के तुरंत बाद शौच के लिए व्यक्ति ठहर नहीं सकता। (अर्जेन्टम नाइट्रिकम); बीयर पीने से दस्त लग जाए; पेट इतना भरा लगे मानो फट जाएगा; पेट में इतनी गड़गड कि कमरे में सबको सुनाई दे; दस्त में पट-पट; सवेरे उठते ही दस्त की हाजत। इस औषधि में मल को न निकलने देने की गुदा की पेशियां इतनी ढीली पड़ जाती हैं कि मल गुदा में आते ही निकल जाता है मानो गुदा हर समय खुली ही रहती है; मल में जेली की तरह श्लेष्मा (म्यूकस) होती है; सवेरे रोग की वृद्धि होती है; दर्द हो तो कोलोसिंथ को दोहरा देने से लाभ होता है।

फास्फोरस ऐसिड 1 — इसमें पोडो की तरह भारी-भारी दस्त आते हैं, वायु अधिक, किंतु दोनों में भेद यह है कि इसके दस्तों में बदबू नहीं होती, दर्द नहीं होता, पोडो में बदबू और दर्द दोनो होते हैं। दस्त आने से पहले आंतों में गड़गडाहट होती है। इसकी विलक्षणता यह है कि यद्यपि रोगी बार-बार जाता है, किंतु उस लिहाज से उसे कमजोरी बहुत कम होती है, बच्चा दस्त करके फिर खेलने भाग जाता है, बच्चे की माता कहेगी कि उसे छह सप्ताह से दस्त आ रहे हैं, किंतु उनसे वह कमजोर नहीं हुआ। यह हो सकता है कि इसके दस्तों में अपच-भोजन रहे और खाना खाते ही उसे मल-त्याग के लिए भागना पड़े। जिन बच्चों की वृद्धि जल्दी-जल्दी हुआ करती है, उन्हें दस्त आने पर प्रायः इस औषधि की आवश्यकता पड़ जाती है।

डल्केमारा 30 — बरसाती ठंड लगने से दस्त आना, सीलन ही जगह रहने से दस्त आ जाना। बरसात में एकदम दस्तों का आक्रमण। दिन में दो बार पीला, पनीला दस्त जिसके आने से पहले पेट में काटता हुआ दर्द हो, इसके हर रोग का कारण हैठंडा, बरसाती मौसम।

पाइरोजैन 200 — गर्मी के मौसम में एकदम, अचानक, शक्तिहीन कर देने वाले दस्त, मात्रा में भारी-भारी, पनीले, दर्द-रहित, बहुत बचैनी। डॉ० टायलर का कथन है कि ग्रीष्म-ऋतु में शक्तिहीन कर देने वाले दस्तों में यह औषधि चमत्कारी प्रभाव डालती है।

नक्सवोमिका 30 — इस औषधि के दस्त भारी-भारी नहीं होते, हर बार थोड़ा-थोड़ा दस्त आता है, अधिकतर आंव आती है, जोर लगाना पड़ता है। अन्य औषधियों में प्रायः भारी-भारी दस्त आते हैं।

पल्सेटिला 30 — गरिष्ठ भोजन, आइसक्रीम, पेस्ट्री, पेटीज आदि खाने के बाद आधी रात बीते या तत्काल दस्त आ जाने में इस औषधि का विशेष महत्व है। क्रोध, भय आदि उद्वेगों से दस्त आ जाने पर ओपियम, वेरेटूम, अर्जेन्टम नाइट्रिकम की तरह पल्स भी दिया जा सकता है। इसके दस्त हरे, पीले रंग के होते हैं। या किसी एक रंग के न होकर रंग बदलते रहते हैं।

अर्जेन्टम नाइट्रिकम 30 — जो लोग मीठा अधिक खाते हैं, उन्हें अक्सर दस्त लग जाते हैं। रोगी मीठा खाये चला जाता है, वह पचता नहीं, दस्त आ जाते हैं, मीठे के कारण ही पेट वायु से भरा रहता है; रोगी पानी पीता है, पानी पीने के साथ ही दस्त आ जाता है। दस्त और उल्टी एक साथ (ऊपर से उल्टी, नीचे से दस्त), किसी विचार आदि के कारण दस्त लग जाना। उद्वेगों के कारण दस्तों का जिक्र हम अभी पल्सेटिला में कर आये हैं। डर से दस्त आ जाना-यह एकोनाइट, जेलसिमियम तथा ओपियम में भी है। इसका दस्त हरे रंग का होता है। बेचैनी आर्स तथा अजेन्टम दोनों में है, किंतु आर्स की बेचैनी का रूप यह है कि रोगी एक जगह टिक कर बैठता नहीं, बेचैनी में कभी बैठता है, कभी खड़ा हो जाता है; अर्जेन्टम की बेचैनी केवल नर्वस होती है, लंबी-लंबी आहें भरने लगता है, श्वास लेने में उसे कष्ट अनुभव होता है। बच्चा खाना खाते ही दस्त कर देता है, ऐसा लगता है मानो खाना पेट में जाने के बजाय सीधा आंतों में जा पहुंचता है, अर्थात उसके खाने का मार्ग पेट और वहां से झट नीचे का है, बीच में वह नहीं टिकता।

क्रोटन टिग 6, 30 — जब दस्त आता है, तो आंतों में पानी छलकने का-सा अनुभव होता है। दस्त ऐसे निकलता है मानो नलके से पानी झर्र-से निकल पड़ा हो। दस्त का नलका खुलने से पानी की तरह निकल पड़ना पोड़ो में भी है, किंतु पोडो में प्रातः 3 बजे रोग का बढ़ना है, क्रोटन में खाने या पीने के साथ ही दस्त की हजत होती है। कोटन का यह लक्षण अर्जेन्टम नाइट्रिकम में भी है, किंतु क्रोटन का दस्त पीला, पनीला होता है और अर्जेन्टम का हरे रंग का। दस्तों की यह एक उत्तम औषधि है। क्रोटन के दस्त के साथ जी मिचलाना तथा वमन भी हो सकता है।

सल्फर 30 — इसके दस्तों का विशेष-लक्षण यह है कि रोगी प्रातःकाल 4-5 बजे उठते ही बिस्तर छोड़ दस्त-त्याग के लिए दौड़ पड़ता है, बिस्तर में पड़ा नहीं रह सकता। यह लक्षण ब्रायोनिया में हरकत से रोग का बढ़ना पाया जाता है। नेटम सल्फ में भी प्रातःकाल दस्त का होना पाया जाता है, लेकिन दस्तों में खूब वायु सरती है, दस्त दोपहर से पहले-पहल आता है, बिस्तर में पड़े-पड़े ही हाजत नहीं होती, ब्रायोनियों की तरह बिस्तर छोड़कर चलने-फिरने के बाद दस्त की हाजत होती है। रूमेक्स के दस्त सल्फर की तरह बिस्तर से उठते ही आते हैं, किंतु इसके दस्तों के साथ खांसी का कष्ट भी जुड़ा रहता है। पोडोफाइलम में भी सल्फर के दस्तों के लक्षण हैं, रोगी बिस्तर से उठते ही बाथरूम को भागता है, किंतु पोडो के दस्तों के साथ जिगर का कोई रोग, जिगर का दर्द आदि होता है, पोडो के दस्त दिन भर बने रहते हैं, केवल प्रातःकाल तक ही सीमित नहीं रहते। पेट्रोलियम में भी प्रातःकाल के दस्त आते हैं, किंतु वे भी दिन भर बने रहते हैं। फास्फोरस तथा डायोस्कोरिया में भी प्रातःकाल के दस्त मौजूद हैं, किंतु डायोस्कोरिया में दस्तों के समय नाभि से दर्द उठता है, वहां से उठकर शरीर के अन्य भागों में फैल जाता है। सल्फर के रोगी के दस्त भिन्न-भिन्न प्रकार के होते है, पीले, पनीले, इतने बदबूदार कि मल की बू हर समय रोगी के साथ बनी रहती हैं, ऐसे दस्त जिनमें आंव के साथ रक्त की कुछ धारियां भी हो सकती हैं, प्रायः दस्त आने से पहले पेट में दर्द होता है।

स्प्रिट कैम्फर — जाड़ा, कंप, पाकस्थली में दर्द, हाथ-पैर और मुंह ठंडा; गर्मी के दिनों के पतले दस्त और सर्दी से पैदा हुए अतिसार में; नया अतिसार एकाएक शुरू हो जाने पर।

किनियम-आर्स 6x — साधारणतः जो अतिसार दिखाई देता है, वह इस औषधि से अच्छा हो जाता है।

रियूम 3 — रोगी के मल में खट्टी गंध निकलना (विशेषतः बच्चों के दांत निकलते समय के उदरामय में), पेट में शूल की तरह दर्द, मल लगना पर न होगा।

क्रोटन टिग्लियम 6 — पीले रंग का पानी की तरह का दस्त बहुत अधिक परिमाण में होना।

एपिस 3, 30 — दर्द के समय सब्ज आभा लिए पीले रंग का दस्त, रोज सवेरे पतले दस्त।

रियुमेक्स 3 — सवेरे के समय पतले दस्त, भूरे रंग के पतले दस्त, दस्त का वेग अधिक, सवेरे रोगी की नींद खुल जाती है और वह मल-त्याग के लिए दौड़ पड़ता है।

जेलसिमियम 1X — एकोनाइट के लक्षण मिले अतिसार के साथ सिर में दर्द होने पर।

एकोनाइट 3x — जाड़े के दिनों की ठंड (अर्थात सूखी ठंडी हवा लगना) लगने के कारण पतले दस्त आना, पहाड़ी जगहों के अतिसार; सिरहन मालूम होना; ज्वर और प्यास का लक्षण होना, इसमें यह औषधि अच्छा काम करती है।

कैमोमिला 6, 30 — हरे रंग के, पानी की तरह, गरम या बदबूदार दस्त, पित्त की कै, पेट में ऐंठन, सिरदर्द, दस्त गांठ-गांठ या पानी की तरह, हरा या भूरे रंग का दस्त, सड़े अंडे की तरह गंध वाला दस्त।

एण्टिम क्रूड 6 — सफेद क्लेद भरी जिह्वा, डकारें आना, मिचली, अरुचि, पानी की तरह पतले दस्त, पित्त मिला कफ।

इपिकाक 3x, 6 — वमन या मिचली, बदबूदार मल, रक्त मिला पेशाब, पेट में गर्मी के साथ गर्मी के दिनों का अतिसार, पीला या पीलापन लिए हरे रंग का दस्त, वमन के साथ देस्त।

ओलियेंडर 3, 30 — (पुराने अतिसार में) अपच का मल रहने पर इससे लाभ होता है।

जिजिवारे 6 — दूषित पानी पीने के कारणे पतले दस्त आने पर यह उपयोगी है।

थूजा 6, 30 — पतले पीले पानी की तरह दस्त, रक्त भरे चिकने दस्त; गड़गड़ाकर जोर से दस्त आना; टीका लगवाने के कुफल रूप में दस्त; धातु में प्रमेह विष रहने के कारण अतिसार, पुराना अतिसार; रोगी का कमजोर होते जाना।

कोलचिकम 3x — नए अतिसार में तेज मिचली और सुस्ती; खाने की गंध से ही वमन होने लगना, शरद्-ऋतु का अतिसार; मल में सफेद खंड-खंड कण दिखाई देते हैं।

आइरिस-वार्स 6 — हैजे का लक्षण रहने वाला अतिसार; पेट में बहुत दर्द, मलद्वार में जलन; वर्मन या मिचली; सिरदर्द; अनजान में मल निकल जाना आदि में उपयोगी है।

मर्क कोर 3 — रक्त मिले या पित्त मिले दस्त; पेट में दर्द; आंव भरे दस्त के साथ कूथन; मल होने के बाद भी कूथन का बंद न होना; मिट्टी की तरह या पीले रंग के दस्त; बेहद सुस्ती।

मर्क वाइवस 6 — पित्त मिले, आंव भरे या रक्त मिले दस्त; मल होने के पहले पेटदर्द और मल होने के बाद दर्द का बंद होना; कांच की तरह या पीले रंग का दस्त; बार-बार पतले दस्त; दोहरा जाने पर पेट का दर्द बंद हो जाना; पेट खाली मालूम होने पर भी रोगी का ज्यादा भोजन न कर सकना आदि लक्षणों में।

मर्क-सोल 6, 30 — कूथन और दर्द, रोगी मल-त्याग करना छोड़ना ही नहीं चाहता, वह समझता है कि अभी और मल होगा; पेट साफ नहीं होता।

कैल्केरिया कार्ब 6, 30 — कमजोरी और शीर्णता; चेहरा रक्तहीन; कभी अरुचि या कभी भूख; अम्ल से पैदा हुए पुराने उदरामय में पतला लसदार दस्त; बार-बार दस्त की हाजत होना।

एसिड फाँस 3x, 6 — बिना दर्द का पतला सफेद दस्त; अनजान में निकल जाने वाले तथा सुस्ती लाने वाले दस्त; दस्तों के बाद कमजोरी का मालूम न होना।

ट्राबिडियम 30 — खाने-पीने के बाद ही पेट में दर्द और कूथन; बदबूदार दस्त, कभी-कभी रक्त मिले दस्त; रक्तामाशय; मलद्वार में जलन।

सोरिनम 200 — बहुत बदबूदार दस्त; रोगी के शरीर और श्वास-प्रश्वास से भी बदबू निकलती है। जहां चुनी हुई औषधि से कोई लाभ नहीं होता, वहां एक मात्रा इस औषधि के प्रयोग से आश्चर्यजनक लाभ दिखाई देता है।

नूफर लुटिया 3 — सवेरे 4 से 7 बजे तक अतिसार; खट्टी गंध, भूरे पीले रंग के पानी की तरह पतले दस्त; उदर में वायु-संचय; मल होने के बाद मलद्वार में जलन।

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