डिप्थीरिया का होम्योपैथिक इलाज [ Homeopathic Medicine For Diphtheria ]

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इस प्राणघातक रोग से शरीर का रक्त दूषित हो जाता है। जिन्हें प्रायः तालुमूल प्रदाह हो जाता है, मसूढ़े फूल जाते हैं, दांतों में कीड़ा लग जाता है, गले में दर्द होता है, वो ही इस रोग से पीड़ित होते हैं। रोगी को कोई पदार्थ निगलने में बहुत कष्ट होता है, गले में बहुत दर्द और पीड़ा होती है; दूध या पानी के घूट लेने में भी दर्द होता है, ज्वर हो जाता है। रोग यदि साधारण हुआ, तो गले में थोड़ा-थोड़ा दर्द, निगलने में कष्ट और शरीर में दर्द आदि कई उपसर्ग दिखाई देते हैं।

जीर्ण रोग में गरदन अकड़ जाती है और कान में दर्द होता है, जबड़े के दोनों तरफ की गांठें फूल जाती हैं। गले के भीतर के सफेद पदार्थ-टांसिल, उपजिह्मा, गल-कोष और नाक तक फैल जाते हैं, उससे श्वास लेने में बहुत कष्ट होता है। ये सफेद पदार्थ कभी-कभी श्वासयंत्र तक फैल जाते हैं। स्वरयंत्र (श्वासनली) पर रोग का आक्रमण हो जाने पर यह समझने में कोई कठिनाई नहीं होती कि रोगी का श्वास लेने में मार्ग बंद हो जाएगा, कितनी ही बार तो श्वास बंद होकर मृत्यु भी हो जाती है। श्वास आने-जाने का मार्ग बंद हो जाने के कारण रोगी को बड़ी जोर से और बड़े कष्ट से श्वास लेना और छोड़ना पड़ता हैं।

गले के भीतर एक प्रकार की जोर की आवाज होती है, पसलियां खिंच-सी जाती हैं, शरीर नीला पड़ जाता है। यह अत्यंत सांघातिक प्रकार का रोग है, यह प्रायः जानलेवा सिद्ध होता है। यदि प्रदाह अन्न-नली में चला जाता है, तो रोगी कोई भी चीज निगल नहीं सकता। डिफ्थीरिया के साथ कभी-कभी ब्रांको-न्युमोनिया, ब्रांकाइटिस आदि उपसर्ग भी रहते हैं। पक्षाघात इस रोग का एक प्रधान उपसर्ग है, यह प्रायः डिफ्थीरिया आरोग्य होने के दो-चार सप्ताह बाद प्रकट होता है; पक्षाघात तालु पर आक्रमण कर देता है, तो रोगी नकियाकर (नाक से) बोलता है, जब कोई चीज खाता-पीता है, तो वह नाक से निकल जाती है।

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यद्यपि डिफ्थीरिया एक सांघातिक रोग है, पर होम्योपैथिक चिकित्सा से बहुत से रोगी आरोग्य होते हैं। इस पर भी सौ में पचास रोगी काल के गाल में चले जाते हैं। जो रोगी आरोग्य की ओर अग्रसर होते, उनके श्वास की बदबू जल्दी दूर हो जाती। है, प्रदाह घट जाता है। नए रोगियों के संबंध में यह बात याद रखना बहुत जरूरी है। कि रोग की शुरुआत में गला बहुत दुखता है, कोई भी चीज निगलने में और श्वास छोड़ने व लेने में बहुत कष्ट होता है, टांसिल और टेंटुआ सूज जाते हैं और थोड़े ही। दिनों में टांसिलों और तालु पर झिल्ली आ जाती है जो पूरे गले को घेर लेती है। यदि समय रहते इसकी रोकथाम न की जाए, तो रोगी की मृत्यु निश्चित हो जाती है। इस रोग की मुख्य औषधियां निम्नलिखित हैं —

कैलि बाईक्रोम 30, 200 — गले के भीतर गहरा एक गोलाकार जख्म, निगलने के समय बाएं कान में दर्द, जिल्ला पर मोटा पीला लेप, मुंह में बदबू; पैरोटिड (कर्णमूलीय), गले की ग्रैविटी (सरवाइकैल) और हनुनिम्नस्थ (सब-मैक्सिलरी) गांठें। फूली हुईं। इसका स्राव गोंद की तरह लसदार रहता है, सहज में ही मुंह से नहीं निकलता, होंठ में चिपक जाता है। डॉ० मिचेल का कथन है इस रोग में यदि पहले से ही धैर्य के साथ मर्क्युरियस और कैलि बाईक्रोम इन दोनों औषधियों का व्यवहार किया जाए, तो रोग कभी सड़ने वाला आकार धारण नहीं करती।

मर्क्युरियस-बिन-आयोड — टेंटुए में दूध की मलाई के टुकड़ों की तरह पदार्थ इकट्ठा होता है और यह आसानी से निकल जाती है। बहुत गाढ़ी और डोरे की तरह लार बहती है। खाने-पीने में बहुत कष्ट होता है, ऐसा मालूम होता है मोनों गले में कोई छोटी-सी गेंद अड़ी है; रोगी उसे निकालने के लिए लगातार गला खखारा करता है, रोगी को खाने की कोई भूख नहीं रहती।

कैलि क्लोरिकम 3, 30 — मुंह और श्वास में बहुत अधिक गंदी गंध, गले का घाव सड़ा हुआ, साथ ही गले में भयानक दर्द और गले की सभी श्लैष्मिक-झिल्लियां लाल और फूली हुईं, जिह्वा में गहरा जख्म। डॉ० मिचेल का कथन है कि रोगी को पहले यह औषधि देनी चाहिए। यदि इससे कोई लाभ होता न दिखे, तो मूल क्लोरेट-ऑफ-पोटास 1 ग्रेन, 1 आउंस पानी में गलाकर उसे चाय की एक चम्मच की। मात्रा में प्रति दो-तीन घंटे के अंतर से कई मात्राएं देनी चाहिए। फिर भी लाभ न हो, तो कोई अन्य औषध प्रयोग करनी चाहिए।

एसिड म्यूर 30 — दांत बहुत ज्यादा मैले, होंठों पर पपड़ी जमी हुई, मुंह से सड़ी बदबू निकलती है, शरीर में बहुत कमजोरी, रोग टाइफॉयड अवस्था में परिणत हो जाने पर और उसके साथ सड़ा गंध भरा रक्त नाक से निकलना आदि लक्षण रहने पर यह औषधि प्रयोग की जानी चाहिए।

लैक कैनाइनमें 6, 200 — क्षण भर भी स्थिर न रहने वाली छटपटी, अनिद्रा, रात भर बिस्तर पर करवटें बदलते रहना, हाथों की हथेलियां और पैरों के तलुवे आग की तरह गरम, मुंह और गले के भीतर बहुत लार होना, पहले लाल हुई जगह पर गोलाकार सफेद दाग और जख्म हो जाना आदि लक्षण प्रायः इस रोग (डिफ्थीरिया) में दिखाई देते हैं। इसका दर्द और जख्म पहले एक ओर, दूसरे दिन दूसरी ओर हो जाता है; फिर पहले वाली जगह पर होता है, जख्म में बहुत पीड़ा रहती है। यह जख्म लाल रंग का, चमकीला और चमकता हुआ दिखाई देता है नाक के स्राव से नाक का छिद्र और होंठों की त्वचा उधड़ जाती है। डॉ. लिपि का कहना है कि शरीर के जिस किसी भी स्थान में जख्म क्यों न हो और उसमें अंत वाले लक्षण रहें, तो यह औषधि बहुत लाभ करती है।

डिफ्थेरिनम 30, 200 — डॉ० क्लार्क इस रोग में डिफ्थेरिनम, मर्क्युरियस सियानेटस और फाइटोलैक्का-इन तीन औषधियों को ही श्रेष्ठ स्थान प्रदान करते हैं। डिफ्थेरिनम एक नोसोड औषधि है। यह डिफ्थीरिया, लेरिंजियल डिफ्थीरिया और डिफ्थीरिया के आरोग्य हो जाने के पश्चात जो पक्षाघात होता है, उसमें भी लाभ करती है। इसका रोग पहले से ही सांघातिक भाव धारण करता है। गांठे फूल जाती हैं, जिह्य भी फूलती है, सभी स्राव में बदबू रहती है, झिल्ली मोटी और काली होती है, नाक से रक्त गिरता है, बहुत दुर्बलता रहती है, कोई पतला पेय लेने पर उल्टी हो जाती है या नाक से बाहर निकल जाता है। डॉ. एलेन का कहना है कि यदि रोग ज्ञात हो जाए कि यह डिफ्थीरिया है, तो यह औषधि अवश्य ही देनी चाहिए। वे कहते हैं कि इसके उच्च-क्रम (200 या और भी ऊंची शक्ति) की 2-1 मात्रा के प्रयोग से रोग घट जाता है। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि दूसरी किसी औषधि की आवश्यकता ही नहीं होती, रोगी आरोग्य हो जाता है। इस औषधि का जल्दी-जल्दी देना उचित नहीं है, इसकी 1-2मात्रा ही बहुत होती हैं।

एपिस 30 — गला भीतर से वारनिश किया हुआ-सा लगता है, चमकीला लाल, टांसिल फूले हुए, गल-जिह्वा भी फूल जाती है और फूलकर लंबी हो जाती है, सूज जाती है; गले में कुछ भी स्पर्श नहीं किया जाता, गला फूल जाता है, यह इस रोग के विशेष लक्षण हैं। इस रोग में यह औषधि सदैव उपयोगी सिद्ध हुई है।

मर्क्युरियस सियानेटस 6, 30 — उपजिया और गले के भीतरी भाग का फूलना, टेंटुआ में दूध की मलाई के टुकड़े की तरह या सफेद पर्दे की तरह एक प्रकार का पदार्थ इकट्ठा होता है। गांठे फूलती हैं, श्वास-प्रश्वास में भयानक सड़ी गंध रहती है, नाक से रक्तस्राव होता है, कोई चीज निगलने में बहुत कष्ट होता है, बहुत कमजोरी रहती है और कभी-कभी ज्वर भी रहता है, नाड़ी भी बहुत तेज हो जाती है। डॉ० क्लार्क का कहना है जीर्ण रोग में, डिफ्थीरिया एपिडेमिक के समय इस औषधि के द्वारा बहुत से गले के जख्म और डिफ्थीरिया के रोगी उन्होंने आरोग्य किए थे। वे पहले 6 शक्ति और अंत में 30 शक्ति की औषधि प्रयोग करते थे। साधारणतः निम्न की अपेक्षा इसकी उच्च शक्ति अधिक लाभ करती है। इस रोग की यह प्रधान औषधि है। स्वरयंत्र और नाक दोनों स्थानों के रोग में इससे लाभ होता है।

लैकेसिस 30 — रोगी की गरदन की ग्रंथियां फूल जाती हैं और कड़ी हो जाती हैं। रोगी कड़ी चीज तो निगल सकता है, पर पतली चीजें नहीं निगल सकता, भयंकर कष्ट होता है। शरीर में बहुत अधिक ऐंठन का दर्द रहता है, उस दर्द को घटाने के लिए बराबर इधर-उधर करवट बदला करता है और छटपटाता है। गल-नली और अन्यान्य अंगों का पक्षाघात हो जाता है। रोगी हमेशा बुदबुदाकर बका करता है, हृदय दुर्बल हो जाता है, शरीर पर ठंडा पसीना आता है। रोगी को निगलने में भयानक कष्ट होता है और स्वर लोप हो जाता है। इसका रोगी-रोग का सूत्रपात होते ही कमजोर हो जाता है, पाखाना बहुत बदबूदार होता है, गरदन में बहुत दर्द रहता है, किसी को छूने नहीं देता, गले में भी भयानक दर्द रहता है। यदि रोगी से जिह्वा को बाहर निकालने को कही जाता है, तो वह जिह्वा स्थिर नहीं रख सकता, वह इधर-उधर हिलती और कांपती है-इन लक्षणों में लैकेसिस का प्रयोग लाभकारी है।

एसिड कार्बोलिक 30, 200 — इस रोग का प्रधान लक्षण है-गले के भीतर इतना ज्यादा दर्द नहीं होता कि रोगी कराहने लगे, बह्त अधिक परिमाण में सफेद-सफेद पर्दे की तरह पदार्थ जमा होता है, मुंह से बहुत बदबू आती है, सेप्टिक की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता; बहुत दुर्बलता के साथ सामान्य ज्वर, नाड़ी अत्यंत क्षीण। इन लक्षणों में यह औषधि उपयोगी है।

एसिड नाइट्रिक 6, 30 — मुंह में घाव, बहुत अधिक लार बहना, उच्च ज्वर, सविराम नाड़ी, मुंह में सड़े घाव, निगलने के समय बहुत दर्द होता है। यदि रोगी को उपदंश का रोग हो, तो इससे लाभ होता है।

फाइटोलैक्का 30 — रोगी के गले में भूरे-सफेद रंग की मोटी, चिपटने वाली झिल्ली पैदा हो जाती है, जो छूटती नहीं है और गले में ही चिपटी रहती है। टांसिल तथा डिफ्थीरिया दोनों के लिए यह प्रसिद्ध औषधि है। गला और तालु सूज जाते हैं, रोगी पानी तक को नहीं निगल (पी) सकता। लाइकोपोडियम की तरह आरंभ भी प्रायः दाईं तरफ से होता है, किंतु लाइको गर्मी चाहता है, फाइटो ठंड चाहता है। रोगी गले में ढेला-सा अटका महसूस करता है, दर्द गले से कान तक जाता है। फाइटो मूल-अर्क की 5 बूंद एक औंस पानी में डालकर उसके गरारे करने से भी गले में लाभ होता है।

बेलाडोना 30 — रोग की पहली अवस्था के प्रदाह के लक्षणों में लाभ करती है। गला भीतर से लाल रंग का, बहुत दर्द, निगलने में कष्ट, उच्च तीव्र ज्वर आदि इसके लक्षण हैं।

एपिस मेल 30, 200 — स्वरयंत्राच्छद (एपिग्लांटिस) में उपदाह के कारण निगलने में बहुत पीड़ा होती है, गले की आवाज बैठी रहती है, श्वास बंद होने की उपक्रम, श्वास-प्रश्वास में कष्ट, गले में कोई कपड़ा रोगी को सहन नहीं होता, पेशाब बंद या पेशाब में कष्ट होता है, बहुत कमजोरी रहती है, आंखों के चारों तरफ सूजन, गरदन और मुंह शोथ की तरह फूले, गले के भीतर का रंग देखने से ऐसा मालूम होता है, मानो वारनिश किया हुआ है, उपजिा फूली रहती है, गले में डंक मारने की तरह दर्द और जलन होती है, निगलने के समय कान में दर्द होता है। आरक्त-ज्वर के रोग के साथ डिफ्थीरिया होने पर इस औषधि से विशेष लाभ होता है।

एरम ट्राइफाइलम 30 — होंठ फूल जाते हैं, रोगी नाक को खुजलाता है, उससे रक्त निकलता है। श्वास में बदबू रहती है और बहुत बेचैनी रहती है, गले में सफेद पर्दा पैदा हो जाता है, घाव हो जाता है। नाक, मुंह और गले से जो स्राव निकलता है, वह अत्यंत कटु या तीता रहता है, जिस स्थान से निकलता है, उस स्थान की त्वचा उधड़ जाती है, तब इसे दें।

ऐमोनियम कॉस्टिकम 30, 200 — प्रदाह स्वरयंत्र तक फैलकर गला फंसना, स्वरभंग और क्रूप की तरह खांसी आती है। फैरिंग्स का ऊपरी अंश, गले का भीतरी भाग और टांसिल बहुत लाल हो जाता है। पहले से कमजोरी रहती है, श्वास-रोध का उपक्रम होता है, रोगी बेचैन हो जाता है, श्वास लेने के लिए बिस्तर से उठकर कमरे में चहल-कदमी करने लगता है। इस औषधि से उसका भला होता है, रोग आरोग्य हो जाता है।

मर्क सायनेटसे 6 — इस औषधि से बहुत लाभ होता है। कई होम्योपैथ इसे इस रोग में विशिष्ट मानते हैं। 6 शक्ति में अधिक लाभ करती है, प्रति 3 घंटे में दें। डिफ्थीरिया के बाद के पक्षाघात में भी उपयोगी है। गला पक जाने में इससे लाभ होता है।

इस रोग में और भी कई औषधियां हैं, जिनकी प्रायः आवश्यकता पड़ती है, जैसे रोगी का हार्ट फेल होने का उपक्रम होने पर डिजिटेलिस, एमिल नाइट्रेड, कैक्टस आदि। पक्षाघात हो जाने पर जेलसिमियम, आर्सेनिक, कॉस्टिकम, काक्युलस, स्ट्रिकनिया आदि। टाइफॉयड-ज्वर की अवस्था में रस-टॉक्स, बैप्टीशिया आदि की आवश्यकता पड़ती है।

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