हड्डियों तथा ग्रंथियों की टी० बी० का होम्योपैथिक इलाज [ Homeopathic Medicine For T.B. Of Bones and Glands ]

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अधिक मानसिक परिश्रम, खराब भोजन, अधिक स्त्री-प्रसंग, हस्तमैथुन, अधिक मदिरा का सेवन करना, पारे का अपव्यवहार, गर्मी या कंठमाला दोष होना इस रोग के कारण होते हैं। इस रोग की गांठे मस्तिष्क, जरायु, हड्डी, पाकाशय, आंत, यकृत और फेफड़े आदि में पैदा हो सकती हैं। ये जिस स्थान में पैदा होती हैं, वहां से क्षय का रोग आरंभ होता है। इस रोग का आक्रमण बहुत धीरे-धीरे और गुप्त रूप से होता है। आरंभ में रोग का अंदाजा करना कठिन होता है। पहले सूखी खांसी, बाद में तर, कफ में पीब या रक्त, शरीर का क्षय, संध्या के समय हल्का ज्वर और रात्रि में पसीना इसके प्रधान लक्षण हैं। अजीर्ण, मंदाग्नि, आलस्य, गला बैठना, चलने पर हांफना आदि। लक्षण भी धीरे-धीरे दिखलाई पड़ते हैं।

नैट्रम म्यूर 6x — क्षयरोग में पानी की तरह साफ तरल और फेन भरा या रक्त मिला श्लेष्मा निकलता है। सामान्य हिलने-डुलने से ही रोगी को बहुत कमजोरी मालूम होती है और वह बिस्तर से लग जाता है। वक्ष में पतले श्लेष्मा के कारण से घर-घर आवाज होती है। क्षय-रोगी को पुरानी खांसी के साथ फेन भरा कफ निकलता है। जिन रोगियों की अवस्था अवनति की ओर अग्रसर होती जाती है, उनके लिए यह औषधि उपयोगी है।

कैल्केरिया कार्ब 200 — रोगी ठंड सहन नहीं कर सकता, शरीर से खट्टी गंध आती है। पेट व गले की ग्रंथियों पर इसका विशेष प्रभाव है। यह औषधि हड्डियों तथा ग्रंथियों की टी० बी० में बहुत उपयोगी है। इसकी 3 मात्रा प्रति दिन अधिक समय तक देनी चाहिए।

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ट्युबर्म्युलीनम 200 — जिन रोगियों के वंश में किसी को टी० बी० हुई हो। और अब रोगी में ग्रंथियों आदि टी० बी० के लक्षण उत्पन्न हो जाएं, तो कुछ महीनों में ही इससे लाभ हो जाता है।

ड्रोसेरा 30 — यदि रोगी के गले में टी० बी० के ग्लैंड्स हो गए हों, तो इस औषधि को देने से रोगी के स्वास्थ्य में सुधार आने लगता है। खाया-पिया शरीर को लगने लगता है, चेहरे पर चमक लौट आती है। जिन रोगियों के वंश में किसी को टी० बी० हुआ करती है, उनके जोड़ों और हड्डियों के दर्दो में यह अत्यंत उपयोगी औषधि है।

फास्फोरस 30 — जिन मजदूरों को हड्डियों की टी० बी० हो जाती है, यह औषधि उनके रोग को दूर कर देती है। हड्डियों तथा ग्रंथियों की टी० बी० की यह उत्तम औषधि है।

सिम्फाइटम (मूल-अर्क) 30, 200 — यह औषधि हड्डियों की टी० बी० में विशेष लाभप्रद है।

आयोडियम 2 — यह औषधि ग्रंथियों की टी० बी० में लाभ करती है।

बैराइटा कार्ब 30 — जिनका शारीरिक और मानसिक विकास पूरी तरह से नहीं हो पाता है, जिन्हें ठंड अधिक परेशान करती है, जिनकी हड्यिों में दर्द होता है और ग्रंथियां सूज जाती हैं, उनके क्षयरोग में यह औषधि लाभकारी है।

सल्फर 30 — ग्रंथियों की सूजन तथा अस्थियों के क्षय में, विशेषकर बचपन में इस रोग से आक्रांत होने पर यह औषधि बेमिसाल हैं। इस रोग में जब बच्चा सूखकर कांटा हो जाता है; उसे भूख अधिक लगती है, तब इससे लाभ होता है।

साइलीशिया 200 — रोगी के पांवों में बदबूदार पसीना आता है, सोते समय सिर पर पसीना आता है। इस प्रकृति के साथ यदि उसे हड्डियों और ग्रंथियों की टी० बी० हो, तो उसके लिए यह बहुत लाभकारी औषधि है।

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