तपेदिक या टीबी का होम्योपैथिक इलाज [ Homeopathic Medicine For Tuberculosis ]

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यह एक फैलने वाला छूत रोग है, जीवाणु-तत्ववेत्ताओं का कथन है – ट्यूबर्क्युलोसि बैसिलस नामक एक प्रकार का कीटाणु दुर्बल फेफड़ों में अपना घर बना लेता है, यही इस रोग की उत्पत्ति का कारण है। वंशगत दोष से अर्थात माता-पिता को यदि यक्ष्मा (क्षय-रोग) का रोग रहता है, तो उसकी संतान को भी यह हो जाता है। पुराना ब्रांकाइटिस (वायुनली-भुज प्रदाह), फुफ्फुस में गुटिका दोष, फेफड़े की धमनी में रक्त के थक्के अटकना, बार-बार सर्दी होना, गंदी सीलन से युक्त तर जमीन पर रहना, रुई, रेत या धूल इत्यादि का लगातार फेफड़े में प्रवेश करना, बहुत अधिक धातुक्षय, शराब पीना, रात में अधिक देर तक जागना आदि कारणों से भी यह रोग हो जाता है।

तपेदिक का जर्म सर्वव्यापि है, समुद्र के मध्य या पर्वत की ऊंची चोटी को छोड़कर यह हर जगह होता है। जो लोग शरीर से बहुत कमजोर हैं, वे कहीं से भी इसके शिकार हो सकते हैं। शरीर के अंगों में भी यह किसी भी अंग पर आक्रमण कर सकता है, किंतु मुख्य रूप से इसका आक्रमण फेफड़े तथा आंतों पर होता है। आंतों पर भी इस कीटाणु का आक्रमण फेफड़े से निकले थूक के कारण होता है। जिन रोगियों को फेफड़े का तपेदिक होता है, वे यदि अपने थूक को फेंकने के बजाय निगल जाएं, तो आंतों को तपेदिक हो जाती है। गले के ग्लैंड्स पर और हड्डियों पर भी इसका आक्रमण होता है। यह टी०बी० रोग कहा जाता है।

इस रोग में पहले फुफ्फुस-शिखर पर आक्रमण होता है। तीन-चार महीने बाद नीचे वाले अंश में और दो-तीन महीने बाद और भी नीचे वाले अंश पर, इस प्रकार दस-बारह महीनों के भीतर ही समूचा फेफड़ा रोगग्रस्त हो जाता है। इसके पश्चात क्रमश: एक फेफड़े से दूसरे फेफड़े पर रोग जा पहुंचता है। यक्ष्मा

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(तपेदिक) के लक्षण – थोड़ा-सा ही परिश्रम करने पर थकावट, सिर में दर्द, कलेजे का धड़कना, नाड़ी तेज, पतले दस्त, मुंह में धाव या छाले, शरीर में दर्द, सीने में दर्द, स्त्री-रोगिणी होने पर मासिक ऋतु-स्राव की गड़बड़ी, चेहरे में चमकीलापन, बराबर ज्वर बने रहना, रात के समय पसीना आना, पैर, तलवे और ऐड़ी का फूलना, आंखों में तेजी, जीभ फटी, पेशाब में ईंट के चूरे की तरह तलछट इकट्ठा होना इत्यादि लक्षण पाए जाते हैं। इसके अतिरिक्त शरीर सूख जाता है, खांसी आती है, बलगम के साथ पीब या रक्त निकलता है, मुंह से ताजा रक्त निकलना, हाथ-पैर कछुए की पीठ की तरह टेढ़े पड़ जाना आदि भी इस रोग के लक्षण हैं।

मुंह से रक्त निकलना – रोग की पहली, दूसरी और अंत की सभी अवस्थाओं में यह लक्षण हो सकता है। पहली अवस्था में ऐसा दिखाई देता है कि व्यक्ति (या जो भी बड़ा या बच्चा इस रोग का शिकार हो) अच्छा और स्वस्थ है, खूब घूम-फिर रहा है, फिर एकाएक गले में सुरसुरी होने लगती है, खांसी आने लगती है, खांसी के साथ रक्त भी निकलता है। कभी-कभी ऐसा नहीं भी होता, अपितु पहले थोड़ी-थोड़ी खांसी आती है, खांसी के साथ रक्त के छींटे रहते हैं, कुछ दिनों तक ऐसा ही हुआ करता है। इसके बाद यह बंद हो जाता है और फिर पुनः इसकी शुरुआत हो जाती है। कितनी ही बार इस तरह से रक्त का कई बार निकलना ही इस रोग का प्रधान लक्षण है।

पहली अवस्था में जो खांसी आती है, वह सूखी और उत्तेजक रहती है और उसमें जो बलगम (कफ) निकलता है, उसके साथ फेन रहता है। इसके बाद रोग ज्यों-ज्यों पुराना होता जाता है, त्यों-त्यों फेन का निकलना समाप्त हो जाता है और फिर कफ निकलने लगता है। खांसी पहले खुसखुसी व ढीली रहती है और रोग बढ़ने के साथ ही पुरानी होती जाती है और कष्टदायक होने लगती है। यक्ष्मा की खांसी प्राय: सभी समय आया करती है और थोड़े परिश्रम से यहां तक कि हिलने-डुलने पर भी खांसी आती है।

क्षय-रोग का ज्वर दिन-रात ही बना रहता है। सवेरे ज्वर 99-100 डिग्री रहता है, पर तीसरे पहर 101-102 डिग्री तक बढ़ जाता है, ज्वर चढ़ने से पहले कुछ सिरहन-सी पसीना आता है, रोग की पहली अवस्था में पसीना न रहने पर भी अंतिम अवस्था में बहुत ज्यादा पसीना आता है। ऐसा देखने में आता है कि यक्ष्मा का ज्वर कुछ दिनों तक कुछ घटा रहता है, इसके बाद एकाएक बढ़ जाता है कि जब नई गुटिका उत्पन्न होती है और रक्त संचय अधिक होता है, फेफड़ा ठोस हो जाता है, उस समय ज्वर बढ़ता है और जब वह कम होता है, उस समय ज्वर भी घटा रहता है, शरीर का सूख जाना और खांसी-इन दोनों लक्षणों द्वारा सहज में ही यक्ष्मा की पहचान हो जाती है। किसी रोगी को पहले खांसी आती हो और फिर वह दिनों दिन दुबला होता जा रहा हो, तो यह देखते ही समझ लें कि उस पर थाइसिस रूपी महाकाल आक्रमण कर रहा है। थाइसिस (यक्ष्मा) में शरीर की समस्त पेशी और चर्बी क्षय होती है, इसलिए शरीर कृश होता जाता है और त्वचा सूख जाती है।

बहुत दिनों तक लगातार खांसी, शरीर का सूखना, ज्यादा देर तक काम-काज न कर सकना, धीमा ज्वर, पाचनशक्ति का घट जाना, यदि ये कई लक्षण पहले किसी रोगी में दिखाई दें, तो सर्वप्रथम यक्ष्मा का संदेह करना होगा, ऐसे स्थान पर बीच-बीच में उसके फेफड़ों की परीक्षा कराते रहना आवश्यक है।

क्षय-रोग की आशंका (Threatened Consumption) में निम्नलिखित औषधियां देनी चाहिए :-

कैल्केरिया कार्ब 6 – (हर 6 घंटे) यदि रोगी की कैल्केरिया की प्रकृति हो, मोटा होने की तरफ रुझान हो, दूध बर्दाश्त न कर सकता हो, खट्टी डकारे आती हों, मांस-मछली न खा सकता हो, यदि खाए तो बिना पचे निकल जाता हो, शरीर क्षीण होता जा रहा हो, पसीना अधिक आने लगा हो, यदि रोगी स्त्री है, तो उसका ऋतु-काल रुक गया हो, रोगी शीत-प्रधान हो, ऐसे लक्षणों में यक्ष्मा की आशंका में इस औषधि को देना चाहिए।

कैल्केरिया आयोडाइड 3x – (हर 6 घंटे) यदि कैल्केरिया के उत्त लक्षणों के होने पर रोगी पतला हो, शीत की जगह ऊष्णता-प्रधान हो और ऐसे लक्षणों में क्षय-रोग (तपेदिक) की आशंका हो, तो यह औषधि देनी चाहिए। डॉ० टायलर का कथन है-एक डॉक्टर ने कैल्केरिया की प्रकृति के बच्चों को जो ऊष्णता-प्रधान थे और भूख-भूख चिल्लाते थे, उन्हें इस रोग की आशंका में कैल्केरिया आयोडाइड देकर ठीक (आरोग्य) कर दिया करता था।

आयोडाइन (आयोडम) 2x – (हर 6 घंटे) ऐसे युवा या युवतियां जो बहुत जल्दी बढ़ते दिखें, जिन्हें छाती में रोग की शिकायत हो जाती हो, बढ़ने की जल्दी के साथ कमजोर तथा क्षीण काय होते जाते हों, खुश्क खांसी हो, सारी छाती में खुरखुरी महसूस होती हो, रोगी कहता हो कि छाती में विशेष कमजोरी लगती है, विशेषकर चढ़ाई न कर सकता हो, गरम कमरे में न रह सकता हो, कफ कड़ा और उसमें रक्त का अंश मिला हो, खूब भूख लगती हो, खाने से कष्ट कम हो जाता हो और अच्छा खाने पर भी क्षीण होता जाता हो, ऐसे लक्षणों में यक्ष्मा की आशंका होने पर आयोडाइन देनी चाहिए। इस तरह जल्दी-जल्दी बढ़ने वाली खांसी, छाती के कमजोर रोगियों के लिए फास्फोरस भी उत्तम है।

तपेदिक की मुख्य औषधियां निम्नलिखित हैं :-

कैलि कार्ब 30, 200 – डॉ० हैनीमैन का कथन है कि तपेदिक (यक्ष्मा या क्षय-रोग) का शायद ही कोई रोगी ऐसा होगा जो कैलि कार्ब के दिए बिना ठीक हो सके। इस औषधि को बहुत सोच-समझकर दोहराना चाहिए, क्योंकि यह गूढ़ क्रिया करने वाली औषध है। उन रोगियों के लिए यह विशेषकर उपयोगी है, जिन्हें प्लुरिसी के बाद टी०बी० हो जाती है, छाती में सूई बेधने की-सी टीस उठती है, थूक गोल-गोल, थक्का-थक्का होता है, पांव के तलवे स्पर्श सहन नहीं कर सकते, गला बैठ जाता है, सवेरे खूब खांसी उठती है, बिना यत्न के या थोड़ा-सा ही खांसने से कफ निकल आता है, कफ में थोड़ी-सी रक्त की छींट होती है, प्रातः 3-4 बजे रोग का बढ़ना इस औषधि का चरित्रगत लक्षण है। इस औषधि में आंख की ऊपर की पलक पर सूजन आ जाना इसका विलक्षण लक्षण है। एपिस में आंख के नीचे पलक में शोथ होता है।

आर्सेनिक आयोडियम 30, 200 – डॉ० क्लार्क का कहना है कि सामान्यतः यह औषधि प्रायः सब प्रकार के क्षय-रोग में लाभप्रद है। यक्ष्मा-प्रकृति के रोगियों के लिए इसकी विशेष उपयोगिता है। रोगी को जल्दी-जल्दी ठंड लगकर जुकाम हो जाता है, वजन कम हो जाता है, बच्चा दिनोंदिन कमजोर होता जाता है। जो रोगी टी०बी० की प्रथम अवस्था में हों, दोपहर को तापमान (ज्वर) बढ़ जाता हो, पसीना आता हो, शरीर क्षीण हो जाता हो, उन्हें यह औषधि बहुत लाभ करती है। इस औषधि की 3x की 4 ग्रेन मात्रा प्रतिदिन दिन में 3 बार भोजन के ठीक बाद देनी चाहिए। कभी-कभी इससे रोगी को पेट में दर्द होने लगता है, कुछ दिन बाद दस्त आने लगते हैं। ऐसी हालत में इस औषधि का देना कुछ दिन के लिए बंद कर देना चाहिए। 30 अथवा 200 शक्ति में भी इस औषधि को दिया जा सकता है। यदि आर्स आयोडाइड से लाभ होता न दिखे या इससे लाभ होना रुक जाए, तो यह देख लेना चाहिए कि क्या रोगी की न्युमोनिया के कारण तपेदिक की-सी प्रकृति हो गई है, और यदि ऐसा हो तो कैल्केरिया आर्स 3x पांच ग्रेन प्रति 8 घंटे देनी चाहिए, यदि रोगी के टांसिल बढ़े हुए हैं या उसकी गिल्टियां बढ़ गई हैं, तो कैल्केरिया फॉस 3x तीन ग्रेन प्रति 8 घंटे देनी चाहिए।

फेफड़ों की टी०बी० तथा खांसी की औषधियां निम्नलिखित हैं :-

तपेदिक का मुख्य आक्रमण फेफड़ों पर होता है। हल्की-हल्की और थोड़ी-थोड़ी खुश्क खांसी बनी रहती है। यह खांसी तर भी हो जाती है। एक ही खखार में बिना यत्न के कफ निकल आता है। इस कफ को रोगी कभी-कभी निगल भी जाता है, जिससे अांतों की टी०बी० की संभावना बन जाती है।

फास्फोरस 30 – यह फेफड़ों की टी०बी० की मुख्य औषधि है। इसका फेफड़ों तथा हड्डीओं पर विशेष प्रभाव है। डॉ०केंट का कथन है कि जब टी०बी० (तपेदिक या क्षय रोग) की शुरुआत हो, तब यह उपयोगी औषधि है। रोगी की सिकुड़ी हुई छाती होती है, दुबला-पतला शरीर, जीवनी-शक्ति शून्य। हर बार जब ठंड लगती है, तो वह छाती में बैठ जाती है, ठंड लगने से छाती में घड़घड़ाहट होती है, कफ भीतर चिपका होता है, खांसते-खांसते शरीर कांपने लगता है। रोगी छाती तथा गर्दन से सूख जाता है। खांसी जब बढ़ती है, तो यह खांसी तपेदिक का रूप ले लेती है, तेज ज्वर तक रहता है। डॉ० केंट के अनुसार रोगी को फास्फोरस तब दी जानी चाहिए, जब वह अभी रोग के कब्जे में पूरी तरह नहीं आया हो, पूरी तरह कब्जे में आने के बाद रोगी को 30 शक्ति से नीचे या ऊपर की.शक्ति की यह औषध नहीं दी जानी चाहिए।

लाइकोपोडियम 30 – जो रोगी न्युमोनिया या ब्रांकाइटिस के बाद कभी ठीक ही नहीं हुए, उनके फेफड़ों में सूजन क्रॉनिक हो जाती है और बाद में क्षय-रोग हो जाता है, फेफड़े का बहुत अधिक भाग रोग ग्रस्त हो जाता है, वह ठोस (कड़ा) हो जाता है। ऐसे रोगियों को कब्ज हो जाता है, पेशाब गाढ़ा-सा उतरता है। इन्हें लाइकोपोडियम देने से लाभ होता है।

हिपर सल्फर 6 – यदि रोगी का फेफड़ा ठोस पड़ जाए, जैसा लाइकोपोडियम के विषय में अभी कहा गया है; छाती की घड़घड़ाहट हो, खांसते हुए ऐसी आवाज हो जैसे खोल पड़ गया है, रात को रोग में वृद्धि हो जाए, पीला कफ बहुतायत में निकले, तो हिपर सल्फर 6 को प्रति 2 घंटे बाद देनी चाहिए।

ब्रायोनिया 30 – यदि सवेरे बहुत अधिक खांसी आए, खांसते हुए छाती में काटने का-सा दर्द हो, कंधों के बीच भी दर्द हो, तो इस औषध को देने से लाभ पहुंचता है।

ड्रोसेरा 12 – यदि अधिक खांसने से सीने में ऐंठन हो और खांसते-खांसते खाया-पिया सब निकल जाए, तो यह औषध देनी चाहिए।

स्टैनम 30 – तपेदिक में यदि थूक का स्वाद मीठा हो, छाती फट्टे-सी चपटी हो, तो यह औषध लाभ करेगी। इसका छाती पर विशेष प्रभाव पड़ता है।

कार्बो एनीमैलिस 30 – फेफड़ों के क्षय रोग की अंतिम अवस्था में जब इतनी खांसी आती है कि गला रुंध जाता है, खांसी से रोगी सिर से पैर तक हिल जाता है, पस जैसा बदबूदार थूक निकलता है और खांसते-खांसते हांफने लगता है, तब इस औषध से लाभ होता है।

जिरेनियम मैकुलेटस Q – 5-10 से 30 बूंद की मात्रा में प्रति दो-तीन घंटों का अंतर देकर सेवन कराने से कफ के साथ अथवा मुंह से रक्त का आना बहुत जल्द बंद हो जाता है, चाहे कितना भी अधिक रक्त क्यों न निकलता हो, इससे अवश्य ही लाभ होगा। डॉ० बोरिक का कथन है कि शरीर के किसी भी स्थान से रक्त क्यों न निकलता हो, इसकी दो-तीन खुराक से ही फायदा हो ज़ाएगा।

आर्सेनिक 30, 200 – यक्ष्मा धातु दोष, बहुत अधिक श्वासकष्ट, रोगी सो नहीं सकता। पहले सूखा फेन भरा तार की तरह लसदार कफ निकलता है, इसके बाद हरा, भारी और बदबूदार हो जाता है। अंतिम अवस्था में ज्वर किसी समय भी नहीं उतरता, रोगी मुर्दे की तरह पड़ा रहता है, कमजोर हो जाता है। तेज प्यास लगती है, इस औषधि का निम्नक्रम 2x, 3x विचूर्ण बहुत ज्यादा फायदा करता है, यह डॉ० हेम्पेल का मत है।

स्टैनम आयोड 2x – जब रोग तेजी से बढ़ता जाता है, स्टैनम के लक्षण रहने पर भी उससे लाभ नहीं होता, तीसरी अवस्था में फेफड़े में पीब हो जाती है, उस समय इस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।

फैरम मेट 6, 30 – यक्ष्मा का धातु दोष, समूचे सीने में दर्द, जगह बदलने वाला सूई गड़ने की तरह दर्द। सूखी तकलीफ देने वाली खांसी, नाक और मुंह से खून निकलना, बिना किसी तरह के दर्द के साथ पतले दस्त, श्वास में तकलीफ, गर्मी से रोग का घटना, रोगी स्त्री का रक्तस्राव या तो रुक जाता है अथवा पानी की तरह रज:स्राव होता है, उस समय यह औषध देनी चाहिए।

सल्फर 30, 200 – सदैव इसकी ऊंची शक्ति का प्रयोग करना चाहिए। रोगी सदा ही अपने शरीर में अग्नि की भांति गर्मी का अनुभव करता है, पैरों में जलन के कारण चादर इत्यादि से पैर बाहर निकाल रखता है, सीने के ऊपर भयानक दर्द, पुरानी सूखी खांसी, कभी-कभी पीब की तरह कफ निकलना, पतले दस्त यदि आते हैं तो सवेरे ज्यादा आते हैं और भूख न लगना आदि कितने ही लक्षणों में इसका व्यवहार होता है। यह औषधि कंठमाला और बवासीर के रोगियों के रोग में अधिक लाभ करती है। यदि न्युमोनिया के बाद यक्ष्मा हो जाए, तो यह सर्वाधिक लाभ करती है। इसका फास्फोरस की तरह प्रयोग करना चाहिए।

जैबोरेणडी 2x – यक्ष्मा रोग में अधिक पसीना आने पर यह औषधि दें।

ऐब्रोटेनम 1x – (5 बूंद की मात्रा में 2 घंटे का अंतर देकर) क्षयकास के साथ अंत्रावरक-प्रदाह होने पर, शरीर का बहुत दुबलापन, हमेशा पेट फूला रहे, चेहरा सिकुड़ा, ठंडा, सूखा और पतला, रोगी को ऐसा मालूम होता है कि उसका पेट चिपका हुआ है।

पल्सेटिला 6 – रोग की पहली अवस्था में जब भूख मंद होकर तेल या वसा मिला पदार्थ या काड-ऑयल न पचता हो, रात में खांसी और कफ की अधिकता हो, अधिक परिमाण में पीले रंग का और स्वाद में तोता कफ निकलता हो, तब इसे देने से लाभ होता है।

नक्स जुग्लांस Q, 3x – खांसी, स्वरभंग, छाती में भार मालूम होना, पेट फूलना या कड़ा होना, उदरामय, अजीर्ण, बगल या पुट्ठों में गांठ निकलना और पीब पड़ना।

मलेरिया आफिसिनेलिस 3x – डॉ० बोवेन के अनुसार जहां मलेरिया होता हो (अथवा जहां की जल-भूमि में सदैव पत्ते आदि सड़ा करते हों), वहां के यक्ष्मा रोगियों को यह औषध अधिक लाभ करती है।

नैट्रम आर्स 2 विचूर्ण – इसकी प्रत्येक 3 ग्रेन की मात्रा प्रतिदिन तीन बार सेवन करानी चाहिए, जब रोग बढ़कर हरी आभा वाली अवस्था में आ जाए (अर्थात जब बहुत हरी आभा लिए श्लेष्मा निकला करता हो), तब इसके प्रयोग से विशेष लाभ दिखाई देता है, कुछ दिन सेवन के बाद जब रोग कम होने लगे, तो औषध बंद कर देनी चाहिए।

थ्लैस्पि बर्सा 3x – खांसी के साथ गंदला रक्त आने पर प्रयोग करें।

इपिकाक 3x – खांसी (दमा की तरह), कै, चमकीला लाल रंग का रक्त निकलना, शरीर में दर्द।

सर्दी-खांसी – यह यक्ष्मा का प्रधान कष्टदायक उपसर्ग है। कितनी ही बार रोगी चिकित्सक से इसके लिए मार्फिया आदि अज्ञान करने वाली औषधि प्रयोग करने का अनुरोध करता है। इसके लिए ब्रायोनिया, फास्फोरस, स्टैनम आयोड, कैल्केरिया, आदि औषधियों के लक्षण मिलाकर व्यवहार कराएं।

प्लुरिटिक दर्द होने पर – सरसों को बारीक पीसकर प्लास्टर की तरह बनाकर दर्द वाली जगह पर लगाएं या किसी तरह का गरम सेंक करें। भीतरी सेवन के लिए – ब्रायोनिया, रैनानक्युलस, कैलि कार्ब आदि औषधियों का प्रयोग करने पर लाभ होता है।

पेशी-शूल का दर्द – रेशमी वस्त्र या रुई से सीना बांध रखना ही काफी होगा। भीतरी सेवन के लिए एकोनाइट, सिमिसिफ्यूगा, ब्रायोनिया। डॉ० गुड्नी का कथन है कि नाइट्रेट ऑफ एकोनाइट 3x की दो-एक घंटे के अंतर से कई मात्राएं सेवन कराने पर विशेष लाभ होता है।

ज्वर – यदि ज्वर थोड़ा हो, तो उसमें किसी विशेष औषध की आवश्यकता नहीं होती, केवल आबोहवा बदलने से ही आराम हो जाता है। यदि ज्वर अधिक हो, तो एकदम विश्राम करना आवश्यक होता है। औषधों में फेरम, बैप्टीशिया, फास्फोरस, आर्सेनिक, चिनिनम-आर्स, सैलविया आदि देनी चाहिए।

रात में अधिक पसीना आने पर – आर्सेनिक आयोड, कैल्केरिया कार्ब, कैल्केरिया आयोड, कैल्केरिया फॉस, कार्बो एनिमेलिस, चायना, फेरम, आयोडम, कैलि जैबोरेण्डी, कोनायम आदि को रोग लक्षण देखकर दें।

रक्तस्त्राव – इसे देखकर प्राय: सभी डर जाते हैं, इसलिए इपिकाक, एकालिका, हैमामेलिस, एकोनाइट, मिलिफोलियम, सिकेलि कोर, लीडम, फेरम, जिरेनियम मैकुलेटम आदि औषधी प्रयोग करनी चाहिए।

यक्ष्मा में मुंह से जो रक्त आता है, उसे देखकर सभी डर जाते हैं, पर यह प्राणघातक नहीं है, बल्कि उससे रक्त की अधिकता घटकर रोग का कष्ट घट जाता है। थोड़ा-सा रक्त निकलने पर उतना सावधान न रहा जाए, तो भी काम चल जाता है। लेकिन रक्त यदि अधिक मात्रा में निकलता है, तो रोगी का शारीरिक, मानसिक सभी परिश्रम बंद कर, स्थिर भाव से रखने का प्रबंध करें, रोगी को बोलने तक न दें। उसे बर्फ का टुकड़ा चूसने को दें और समस्त पेयों में बर्फ मिलाकर दें।

टीबी में खानपान

अरवा चावल, गेहूं, चना, पिंड खजूर या बक्स खजूर, बकरी का दूध, गाय का दूध, ताजा मक्खन, छोटी मछली या बकरे के मांस का शोरबा, आटे और गिरी, मुनक्का, किशमिश, मिश्री, आमला, थोड़ी ब्राण्डी, कब्जियत रहे, तो खजूर अधिक लाभ करता हैं। इस रोग में काड-लिवर ऑयल (थोड़ी मात्रा में) लाभ करता है। यक्ष्मा में सर्दी नहीं लगनी चाहिए। स्नान करना, स्नान के बाद शरीर को रगड़कर पोंछ डालना चाहिए। रात्रि में जागना, बहुत अधिक परिश्रम करना और स्त्री-सहवास मना है। रोगी के कमरे की खिड़कियां, रोशनदान, दरवाजा सब खुले रखने चाहिए। अच्छी तरह शुद्ध वायु सेवन करने से फेफड़ा फैलता है, यक्ष्मा (तपेदिक) के रोगी के लिए समुद्र किनारे के मकान में रहना अच्छा है।

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