ट्यूबरकुलस मेनिनजाइटिस का होम्योपैथिक इलाज [ Homeopathic Medicine For Tuberculous Meningitis ]

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यह रोग अधिकतर छोटे बच्चों को और विशेषकर निर्धन बच्चों को ही अधिक होता है। आरक्त ज्चर, छोटी माता, चेचक, पिंग-खांसी, गिर जाने के कारण माथे या सिर में चोट या किसी दूसरी तरह की चोट और मानसिक उत्तेजना, हैजा आदि इस रोग के कारण हैं। जब रोग का आक्रमण होता है, तब बच्चे को शरीर क्रमशः दुबला होता जाता है, मिजाज चिड़चिड़ा रहता है, खेलने की इच्छा नहीं होती; चेहरे का ढंग बदल जाता है; बेचैनी, नींद न आना, भूख न लगना, दस्त साफ न होना, अंग-प्रत्यंग दुबले पड़ जाना इस अवस्था के लक्षण हैं।

पहली उत्तेजक अवस्था “स्टेज ऑफ इरिटेशन” — ज्वर, सिरदर्द, खींचन, वमन आदि उपसर्ग दिखाई देते हैं, कपाल में दर्द, रोगी कातर और बेचैन हो जाता है। यदि बच्चे की आयु कुछ अधिक रहती है, तो वह सिर दबाकर पकड़ रखता है, डर जाने की तरह रह-रहकर खूब जोर से चिल्लाकर रो उठता है। ज्वर पहले से कम रहता है (102-103 डिग्री) नाड़ी मोटी, तेज और अनियमित रहती है। बच्चा सोना चाहता है, पर सो नहीं सकता, केवल तकिये पर सिर हिलाता है।

दूसरी अवसादावरक अवस्थी “स्टेज ऑफ डिप्रेशन” — एक से डेढ़ सप्ताह बाद वमन होना बंद होता है, ज्ञान घट जाता है, प्रलाप भी थोड़ा बढ़ता है, कभी-कभी चिल्ला उठता है, मल बंद और पेट में खिंचाव का भाव रहता है, ज्वर बहुत कम यहां तक कि स्वाभाविक हो जाता है, नाड़ी कोमल और असमान रहती है, गरदन कसकर खिंची रहती है, पीठ में भी खींचन होती है, रोगी पीछे की तरफ टेढ़ा हो जाता है; गरदन में दर्द रहता है, पुतली फैली रहती है, कोई पदार्थ निगल नहीं सकता, अनजाने में मल-मूत्र हो जाता है। होंठ, मुंह और जिह्वा में छाले हो जाते हैं, पेशाब कम होता है, पेट में एक तरह के उद्भेद निकलते हैं।

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तीसरी पक्षाघात वाली अवस्था “स्टेज ऑफ पैरालिसिस” — यह इस रोग की अंतिम अवस्था है। इस अवस्था में सभी लक्षण बढ़ जाते हैं, ताप बढ़ जाता है, नाड़ी खूब तेज, क्षीण और सविराम रहती है। रोगी अज्ञान हो जाता है। गरदन, पीठ, जबड़े और शरीर के किसी अंश में सामान्य अकड़न और किसी अंश में एकदम पक्षाघात हो जाता है। आंखों के भीतर सफेद अंश ही अधिकतर दिखाई देता है, कभी आंखें लाल रहती हैं, नाड़ी सूत की तरह पतली हो जाती है, ज्वर उतर अथवा चढ़ जाता है, अंत में श्वास बंद, खींचन या हार्टफेल होकर रोगी की मृत्यु हो जाती है।

यह सांघातिक रोग प्रायः आरोग्य नहीं होता। यदि रोग का आक्रमण धीरे-धीरे होता है, तो उपचार हो सकता है, लेकिन एकाएक आक्रमण हो जाने पर जीने की कुछ आशा नहीं रहती, अर्थात् भावी फल निराशाजनक ही होता है। रोगी का सिर एकदम मुंडवा देना चाहिए अथवा बाल बहुत छोटे कटवा देने चाहिए और गरदन पर लगातार आइस-बैग रखना चाहिए। बिदाना, अंगूर, संतरा आदि फलों का रस और छेने का पानी, ग्लूकोज आदि सुपथ्य हैं। रोगी को ऐसे कमरे में रखना चाहिए कि रोशनी आंखों में न लगने पाए, पर कमरे में वायु आती-जाती रहे।

टियुबक्युलर मेनिनजाइटिस — एपिस मेल, कैल्केरिया आयोड, साइक्यूटा, आयोडिन, आयोडोफार्म, लाइकोपोडियम।

हाइड्रोकेफालस — एकोन, एपिस, एपोसाइनम, एण्टिम टार्ट, आर्स, बेल, कैल्केरिया कार्ब, कैल्के फॉस, ग्लोनोइन, हेलिबोरस, हायोसियामस, लाइको, साइलीशिया, कैमो, सल्फ, जिंक सल्फ, जिंक ब्रोम, ब्रोमाइड कैम्फर, एट्रोपिन सल्फ।

हाइड्रोकेफालायेड — सिंकोना, हेलिबोरस, पोडोफाइलम, जिंक और हाइड्रोकेफालस की समस्त औषधियां।

मस्तिष्क में विकार — बेलाडोना, हायोसियामस, ब्रायोनिया, ओपियम, काक्युलस, कूप्रम और जिंक आदि।

एकोनाइट 6 — अधिक धूप लगने के कारण रोग की उत्पत्ति, रोगी की पहली अवस्था में बहुत बेचैनी, प्यास, मृत्यु-भय इत्यादि।

एपिस 6, 30 — ज्ञान लोप होना, माथा तकिये के ऊपर इधर-उधर करना, बेहोश-सा रहना, एकाएक जोर से चिल्ला पड़ना; रात में बेचैनी का बढ़ना, शरीर की किसी एक पेशी में अथवा पूरे शरीर में खींचन, जिह्वा लाल, सूखी, कांपती है, जिह्वा में छाले हो जाते हैं, प्यास नहीं रहती।

आर्निका और साइक्यूटा 30 — मस्तिष्क में चोट लगकर रोग होता है, तब इन्हें चार-चार घंटे के अंतर से बारी-बारी देनी चाहिए।

बेलाडोना 6 — साधारण मस्तिष्क झिल्ली-प्रदाह, विपर्स का रोग होकर’ मेनिनजाइटिस, सिर पीछे की ओर खिंचा और तना रहता है, रोशनी सहन नहीं होती। पहले रक्त-संचय और खींचन होकर रोग आरंभ होता है और उसकी वृद्धि होती जाती है। छोटी माता और आरक्त ज्वर के बाद रोग, सर्दी-गर्मी होकर रोग का होना।

ब्रायोनिया 30 — इसे बेलाडोना के बाद व्यवहार करना चाहिए। हिलने-डुलने पर कष्ट बढ़ता है, इसी कारण रोगी स्थिर भाव से चुपचाप पड़ा रहता है। थोड़ा प्रलाप, ज्ञान की कमी, मुंह हमेशा हिलाया करता है मानो कुछ चबा रहा है, होंठ सूखे, प्यास अधिक रहती है।

सिमिसिफ्यूगा 200 — सब चिकित्सकों को यह स्वीकार करना होगा कि इस रोग की कोई सर्वोत्तम औषधि नहीं है, रोगी प्रायः आरोग्य नहीं होते। रोग के लक्षणानुसार रोगी को औषधि देनी चाहिए और रोगी का भावी फल भी देखना चाहिए। यदि किसी औषधि से कुछ लाभ न दिखाई दे, तो इस औषधि की एकेक मात्रा प्रति एकेक घंटे के अंतर से देने की व्यवस्था करें, इससे रोग की तेजी कुछ घटने पर मेडोरिनम 200 यो और भी उच्च शक्ति की एक मात्रा देकर 5-6 घंटे के बाद लाइकोपोडियम 200 शक्ति की 2-1 मात्रा देकर कुछ देर रुकें और इस प्रकार की व्यवस्था करें। आंखें लाल हो जाने पर लाइकोपोडियम के स्थान पर बेलाडोना दें।

सिमिसिफ्यूगा की मेरुदंड के स्नायुओं पर प्रत्यक्ष-क्रिया दिखाई देती है। यह विशेषकर जब मस्तिष्क के उपदाह, प्रदाह और मांसपेशियों के आक्षेप के साथ सुषुम्ना के अन्य भागों में दिखाई देता है। बहुत अधिक बेचैनी, कंडराओं का ऐंठना और एकाएक चौंक पड़ने के साथ प्रलाप में यह औषधि लाभदायक है। जब मस्तक के तलदेश पर सिरदर्द का आक्रमण होता है अथवा उसी स्थान से यह आरंभ होता है, तब कभी-कभी दर्द मस्तक से मस्तक-शिखर और नीचे मेरुदंड तक आघात करता है; गरदन की पेशियों का कड़ापन और सिर हिलाने पर इसके साथ ही कष्ट बढ़ता है।

कूप्रम मेट 30, 200 — किसी भी प्रकार का उद्भेद बैठकर रोग हो गया हो; प्रबल खींचन रहती है, आंख की पुतली चक्कर खाया करती है, रोगी मुट्ठी बांध लेता है, पीठ की रीढ़ में इस तरह दर्द होता है कि स्पर्श सहन नहीं होता।

हेलिबोरस 30 — मस्तक (माथे) में पानी इकट्ठा होने के समय, एकदम बेहोशी, रोगी तकिये में माथा घुसाया करता है, बेहोश-सा पड़ा रहकर एकाएक चिल्ला उठता है। कपाल का मांस सिकुड़ जाता है; आंखें बैठ जाती हैं, टकटकी लगाकर देखा करता है। आंख की पुतली ऊपर की ओर घूमा करती है। पेशाब घट जाता है या बंद हो जाता है। तेज खींचन होती है, पानी देने पर आग्रह के साथ पीता है। मुंह को हिलाया करता है मानो कुछ चबा रहा है; एक बार हाथ, एक बार पैर हिलाया करता है। हृत्पिण्ड (हृदय) क्षीण, नाड़ी क्षीण, शरीर ठंडा रहता है।

हाइपेरिकम 6 — चोट लगकर रोग की उत्पत्ति होने पर दें।

लैकेसिस 30 — विपर्स होने के बाद रोग, यह औषधि बेलाडोना के लाभ के बाद लाभ करती है। पहले माथे के मूद्ध-देश में भयानक दर्द होता है, इसके बाद दर्द समूचे माथे में फैल जाता है।

रस-टॉक्स 6, 30 — कड़ी चीज के ऊपर माथा रखने पर आराम मालूम होता है।

सल्फर 200 — यह प्रायः रोग की दूसरी अवस्था में लाभ करती है। इस अवस्था में डिजिटेलिस हेलिबोरस भी लाभदायक है।

जिंकमे मेट 30 — माथे के तलदेश में बहुत गर्मी मालूम होती है। रोगी डर जाने की तरह रह-रहकर चिल्लाकर जाग उठता है। लगातार पैर हिलाया करता है। उसके अंग-प्रत्यंग हमेशा कांपते हैं और हिल उठते हैं, खींचन हुआ करती है। इससे लाभ न होने पर जिंकमे अक्साइडेटम का प्रयोग करना चाहिए।

साइक्यूटा 30, 200 — रोगी बेहोश-सा रहता है। चेहरे और शरीर की मांसपेशियां स्पंदित हुआ करती हैं। गरदन कड़ी रहती है, माथा पीछे की ओर टेढ़ा पड़ जाता है, रोगी तकिये में माथा घुसाया करता है। यकायक शरीर में बिजली की तरह लहर दौड़कर खींचन आरंभ हो जाती है। आंख की पुतलियां बड़ी हो जाती हैं, चेहरा लाल और गर्म हो जाता है, पसीना आता है।

ओपियम 30 — रोग की अंतिमावस्था में रोगी बच्चा बेहोश हो जाता है। आंखें अधमुंदी रहती हैं, समूचा शरीर ठंडा पड़ जाता है और केवल मुख ही गरम रहता है। गला “घड़-घड़” किया करता है, पसीना आता है। कभी-कभी कोई मांसपेशी रह-रहकर हिल उठती है।

होम्योपैथी में सब प्रकार के रोगों में धातुगत लक्षणों के ऊपर ही औषधियों का प्रयोग किया जाए, तो सबसे अधिक और स्थायी लाभ होता है। इस रोग में कैल्केरिया कार्ब, सल्फर और आयोडम-ये तीन औषधियां लक्षण समझकर यदि प्रयोग की जाएं, तो लाभ स्पष्ट दिखाई देता है। इन्हें अवश्य ही प्रयोग कर देखें।

कैल्केरिया कार्ब 30, 200 — सहज में ही पसीना आ जाता है, विशेषकर माथे पर अधिक पसीना आता है, पैर ठंडे रहते हैं। गाल और गले में गांठें होती हैं, खाया हुआ हजम नहीं होता।

सल्फर 30 — त्वचीय रोग, मस्तिष्कावरक झिल्ली-प्रदाह, मुंह के भीतर प्रदाह और जख्म, कब्जियत की धातु, हाथ-पैर और माथा अग्नि की भांति गरम रहते हैं, शरीर में बेहद जलन होती है, शरीर पर कपड़ा सहन नहीं होता।

आयोडाइड 3, 6 — केवल अकेले व्यवहार न कर लक्षण-भेद के अनुसार कैल्केरिया आयोड या आर्सेनिक आयोड का व्यवहार करें।

आर्सेनिक आयोड 30 — बहुत बेचैनी, कमजोरी, स्नायविक उत्तेजना, विशेषकर दुबले-पतले और कमजोर रोगियों (बच्चों) के, जिनकी गरदन के चारों ओर बड़ी-बड़ी गांठ रहती हैं, यह उनके रोग में अधिक लाभदायक है।

कैल्केरिया आयोड 30 — इस औषधि की धातु और आयोडम की गांठों के लक्षण के साथ दूसरे लक्षण मिलने पर, इसका प्रयोग करना चाहिए।

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