प्रमेह का होम्योपैथिक इलाज [ Homeopathic Remedies For Chyluria ]

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जब मूत्र के साथ “काइल” (अन्नरस) निकलता है, तो उसे “काइल्युरिया” कहते हैं। इस रोग में शरीर की चर्बी ठीक इमल्सन की तरह होकर मूत्र के साथ निकलती है, इसलिए रोगी जो मूत्र-विसर्जन करता है, वह ठीक दूध की तरह दिखाई देता है; कभी-कभी तो इसे देखकर यह बताना कठिन हो जाता है कि यह दूध है या मूत्र; कभी-कभी इस तरह के मूत्र के साथ रक्त भी रहता है, उस समय मूत्र गुलाबी रंग का दिखाई देता है और कभी-कभी उसके साथ चर्बी इतनी ज्यादा रहती है कि यदि मूत्र कुछ देर तक किसी बरतन में रख दिया जाए, तो उसमें मलाई की तरह एक तह पड़ जाती है, तली में मांड की तरह पदार्थ जम जाता है।

काइल्युरिया में मूत्र के साथ चर्बी के सिवा रक्त के श्वेतकण, लालकण और थोड़ा बहुत एलब्यूमिन भी रहता है। ये सब पदार्थ “काईल” के आकार में गठित होकर मूत्र के साथ निकलते हैं; इसलिए इसको “काइल्युरिया” कहते हैं। जर्म-तत्वविदों के मत से एक प्रकार के जीवाणु ही इस रोगी की उत्पत्ति के कारक हैं।

सल्फोनैल (मूल-चूर्णी) — मूत्र में एलड्यूमिन, उसके साथ कास्ट्स, मूत्र का रंग गुलाबी आभायुक्त या लाल-भूरे रंग की आभा लिए हुए हो, लगातार मूत्र-त्याग करने की इच्छा होती हो, किंतु बहुत कम मूत्र होता हो, तो इस औषधि से लाभ होता है। इस औषधि का मूल-चूर्ण 10 से 30 ग्रेन तक की मात्रा में गुनगुने पानी के साथ सेवन करने से रोगी दो घंटे के अंदर बेसुध होकर निद्रालीन हो जाएगा।

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स्टिलिन्जिया — बिना रंग का मूत्र, मूत्र में सफेद तली जमना, दूध या चाय जैसा मूत्र, घना या गाढ़ी मूत्र। इसमें मद-टिंक्चर या निम्न-शक्ति का प्रयोग करना चाहिए।

एसिड फॉस 3x — इस रोग में यह औषधि बहुत अच्छा काम करती है।

उपर्युक्त औषधियों के अतिरिक्त आयोडम, कैलि बाईक्रोम, युपेट पर्युरा, युवा उर्सि, सिना, चेलिडोनियम, कोनियम, लिलियम, मर्क्युरियस, फास्फोरस, रैफेनस, वायोला-ऑडोरेटा आदि औषधियों से दूध की तरह मूत्र आना बंद हो जाता है।

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