पेचिश का होम्योपैथिक इलाज [ Homeopathic Remedies For Dysentery, Infectious Diarrhoea ]

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पेचिश (डिसेण्ट्री) में बड़ी आंत पर रोग का आक्रमण होता है। बड़ी आंत की ग्रंथियों और श्लैष्मिक-झिल्ली में प्रदाह होकर ज्वर, पेट में असह्य मरोड़, खरोंचने की तरह दर्द के साथ आंव, रक्त-मिली आंखें, थोड़ी-थोड़ी करके बार-बार निकलती रहने पर; इसी को रक्तामाशय या पेचिश (डिसेण्ट्री) कहते हैं। पेचिश में साधारण प्रदाह की तरह पहली अवस्था में आंतों में रक्त-संचय होता है, इसके बाद दूसरी अवस्था में उस स्थान में रक्त-संचय होकर सूजन आ जाती है। इस अवस्था में यदि रोग आरोग्य नहीं हो जाता, तो फिर तीसरी अवस्था में आंतों में घाव हो जाता है, जिसका पीब मल के साथ निकला करता है।

रक्तामाशय कभी-कभी एपिडेमिक रूप में प्रकट होता है, अर्थात एक जगह के बहुत से व्यक्तियों को एक साथ यह रोग हो जाता है। साधारणतः अस्पताल, तम्बू तथा मलेरिया वाले स्थान, गीली सीड़ वाली जगह या गांव में ग्रीष्म और शरद् ऋतु की तेज गर्मी में, एकाएक रात के समय ठंड पड़ने पर इसका प्रादुर्भाव होता है।

ऋतु-परिवर्तन, सर्दी लगना, सड़ा और दूषित खान-पान, अधिक मात्रा में फल-मूल खाना, सड़ा या बासी मांस खा लेना, बदबूदार स्थान में रहना, आंतों में कृमि रहनाइत्यादि कारणों से यह रोग हो जाता है। अधिकांश स्थलों में पहले अतिसार के रूप में प्रकट होने के बाद आमाशय के मल में परिणत हो जाता है। रोगी को बार-बार दस्त आते है, वह मले-त्याग की चेष्टा करता है, पर बहुत थोड़ा मल होता है। मल के साथ आंव, रक्त या रक्त मिली आंव रहती है। मल का रंग हरा, पीला, भूरा इत्यादि नाना प्रकार का होता है। आंतों में यदि जख्म हो जाए, तो कटे फोड़े की तरह पीब-रक्त की भांति पीब और रक्त निकलता है, मल में बहुत सड़ी बदबू रहती है।

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इस रोग में मल को रंग स्वाभाविक पीला और मल कड़ा होता जाए, तो समझना चाहिए कि रोग आरोग्य की तरफ अग्रसर हो रहा है। यदि इस समय भी आंव और रक्त निकला करे, तो समझना चाहिए कि प्रदाह घट गया है। इसके बाद ही धीरे-धीरे आंव का परिमाण भी घटकर रोग आरोग्य होगा। पेचिश के दस्त दिन-रात में 5-6 से लेकर 30-40 बार तक हो सकते है. इसमें नाभि के स्थान पर और नाभि के चारों तरफ शूल का दर्द, मरोड़, खोंचा मारने और अकड़न की तरह दर्द होता है। इस तरह का दर्द-मल होने के पहले और मल होने के समय ही अधिक होता है।

दर्द आरंभ हो जाने पर रोगी को दौड़कर मल त्याग के लिए जाना पड़ता है, मल होने के समय पेट में बहुत दर्द होता है, कराहना और कांखना पड़ता है। वह समझता है कि अभी और, मल होगा, पर नहीं होता। यदि रोग का आक्रमण मलांत्र पर होता है, तो दर्द नहीं होता, केवल रक्त या रक्त मिली आंव गिरती है।

बहुत अधिक रक्तस्राव, पीब मिले रस की तरह या चाकलेट के रंग की तरह बदबूदार मल का निकलना, बहुत सुस्ती और कमजोरी, नाड़ी क्षीण और उसकी गति तेज, शरीर ठंड़ा, लसदार पसीना, नीला चेहरा, मलद्वार हमेशा ही खुला रहना, अनजान में मल निकल जाना, आंतों को ढकने वाली झिल्ली का प्रदाह, बड़ी आंत में छिद्र हो जाना, कंपकंपी, विसर्प, हैजा के वमन की तरह तेज वमन, अदम्य हिचकी, प्रलाप, बकना, खींचन, अकड़न, पक्षाघात, पेचिश के साथ मलेरिया ज्वर आदि रोग के उपसर्ग रोगी के लिए अशुभ हैं।

बैसिलरी डिसेण्ट्री

यह बहुत ही कड़े ढंग का रोग है, इसमें दिन-रात में 4050 बार से भी अधिक दस्त आते हैं और कूथन, शूल का दर्द, वेग, ज्चर इत्यादि रहते हैं, रोग सहज में ही आरोग्य नहीं होता है; इसमें आंतों में घाव होता है, कभी यकृत में फोड़ा होता है। मल की परीक्षा करने पर सिगा-बैसिलाई नामक एक प्रकार का कीटाणु पाया जाता है। इसमें होम्योपैथिक औषधियां एकोनाइट, मर्क्युरियस, कोलोसिंथ, नाइट्रिक एसिड, हिपर सल्फर, इपिकाक और ट्रॉम्बिडियम आदि औषधियां विफल होती हैं, और एलोपैथिक-एमेटिन इंजेक्शन से भी लाभ नहीं होता है, क्विनाइन ऐसिड सल्फ-डिल की आवश्यकता पड़ती है।

एमीबिक डिसेंट्री

यह एक नए तरह का रोग है; इसमें बैसिलरी डिसेण्ट्री की तरह दस्तों की संख्या कम या अधिक रहने पर भी कूथन, शूल, वेग, पेट में दर्द इत्यादि सभी रहते हैं। इसमें आंत में शायद ही कभी जख्म होता है, यकृत में फोड़ा नहीं होता है। मल की परीक्षा करने के लिए पहले-एकोनाइट, मर्क्युरियस आदि से उपचार करने पर भी यदि रोग न घटे, तो उसे उक्त बैसिलरी जाति का रोग समझना चाहिए और बड़ी सावधानी से औषध का निर्वाचन करना चाहिए।

साधारण प्रकार का रोग प्रायः 2-3 दिन से लेकर 10-12 दिन के अंदर ठीक हो जाता है। एपिडेमिक-फार्म (बहुव्यापी रूप) में कई सप्ताह से कई महीने और पुराना आकार धारण करने पर कई महीने से वर्ष भर तक लग सकता है। यदि मृत्यु हो, तो कमजोरी और उक्त उपसर्गों से ही मृत्यु होती है। युवाओं की अपेक्षा बच्चों और बूढ़ों की मृत्यु ही अधिक होती है।

इस रोग में पथ्य के संबंध में सावधानी बरतना आवश्यक है। रोग के आरंभ से ही जब तक पेट का कष्ट, कूथन, शूल का दर्द आदि दूर न हो जाए और स्वाभाविक पीला दस्त न आने लगे, तब तक केवल पानी की बनी बार्ली, पानी का बना आरारोट, स्पीड्स आरारोट, शटीफूड, जौ का मांड, छेने का पानी, थोड़ा गरम बकरी का दूध, बकरी के दूध का दही या मट्ठा, गाय के दूध का मट्ठा, बिदाना का रस आदि के अलावा दूसरी तरह का कोई पथ्य रोगी को देना उचित नहीं है। कच्ची बेल सिझाकर या भूनकर देना लाभकारी है। इससे मल बंधता है और मल बंध जाने पर दस्तों की संख्या भी कम हो जाती है। जब तक पूरी तरह से रोग से मुक्ति न मिल जाए, तब तक रोगी को भात अथवा कोई दूसरी कड़ी चीज खाने को न देनी चाहिए।

रोगी को उस समय तक पूरा आराम कराएं, जब तक यह विश्वास न हो जाए कि वह ठीक हो गया है। रोगी का कमरा और बिस्तर हमेशा साफ रखें और मल, वमनं आदि सब घर से दूर फेक दें। पेट में बहुत दर्द रहने पर गरम पानी की थैली से सेंक दें। इस रोग में साधारणतः एकोनाइट, बेलाडोना, कोलोसिंथ, इपिकाक, कैली नाइट्रिकम, लैकेसिस, हिपर और मर्क्युरियस आदि औषधि दी जाती हैं और डॉ० शुसलर के मत से कैलि म्यूर, फेरम फॉस, कैली फॉस और कैलि सल्फ आदि औषधियों की विशेष आवश्यकता होती है। इनमें मर्क्युरियस, एकोनाइट 2x और कैलि म्यूर, कोलोसिंथ, कैलि नाइट्रिक का ही अधिक व्यवहार होता है।

एकोनाइट 2 — रोग की पहली अवस्था में शीत, उच्च ताप (तेज ज्वर), दर्द के साथ जल्दी-जल्दी भूरे रंग के दस्त, अंत में रक्त मिले दस्त हों, तो इससे लाभ होता है। इसके बाद कैलि नाइट्रिक का व्यवहार किया जा सकता है।

एलो 3, 6 — बहुत कूथन, जल्दी-जल्दी रक्त मिले पानी की तरह या आंव के थक्के मिले दस्त, मांड की तरह दस्त; दस्त होने के समय पेट में तेज दर्द के कारण रोगी का अचेत तक हो जाना। नाभि के चारों तरफ या तलपेट के दाहिनी तरफ असह्य दर्द और भार मालूम होना। मल-त्याग के बाद दर्द का बंद हो जाना, बड़ी आंत में गड़गड़ आवाज होना, मल होने के समय आवाज के साथ वायु निकलना, मूल-त्याग के समय मल की हाजत हो जाना, खाने-पीने के बाद वृद्धि इत्यादि इसके लक्षण हैं।

एल्यूमिना 6, 30 — मल और मूत्र दोनों में ही बहुत वेग देना पड़ता हो, मल के अलावा दूसरे समय मूत्र (पेशाब) न होता हो, तो यह औषध लाभ करती है।

आर्सेनिक 30 — मल (दस्त) में बहुत ही गंदी और सड़ी बदबू। बहुत पतले मल के साथ चॉकलेट के रंग का रक्त मिला रहना। आधी रात को 1 बजने के बाद से दस्तों की संख्या बढ़ जाना। दस्त आने के पहले एक तरह की तकलीफ होना और ऐसा लगना मानो मल होने के समय मलांत्र संकुचित हो जाता है। मल होने के बाद मलद्वार के मुंह पर जलन होना, कूथन रहना, शरीर कांपना, कलेजा धड़कना और पेट फूलना, इसके साथ ही बहुत प्यास, वमन, मिचली, आंख-मुंह बैठ जाना, शरीर ठंडा हो जाना, बहुत कमज़ोरी, क्षीण नाड़ी, पेशाब में बदबू इत्यादि लक्षण रहें, तो यह औषधि आभदायक है। …..

बैप्टीशिया 6, 30 — हर बार मल-त्याग से पहले शूल की तरह का एक प्रकार का दर्द होना, अधिक कूथन के साथ बहुत थोड़ी आंव और ताज रक्त निकलना, सान्निपातिक अवस्था प्राप्त हो जाना इत्यादि लक्षणों में इसका प्रयोग होता है।

बेलाडोना 30 — मल का रंग हरा, उसके साथ आंव और रक्त रहना, बहुत कराहनो, मलांत्र और मलद्वार के मुंह पर जलन होना, मलद्वार फूल जाना, पेशाब बंद रहना, तलपेट को दबाने से बहुत दर्द मालूम होना, तलपेट में काटने-फाड़ने की तरह दर्द, दर्द के कारण रोगी को चिल्ला पड़ना। प्यास, डकार, वमन, सोते सोते चौंक उठना आदि।

कैन्थराइटिस 6 — समूचे तलपेट में और मलद्वार में आग से जल जाने की तरह जलन, तलपेट में स्पर्श सहन न होने वाला दर्द, अदम्य प्यास, किंतु कोई भी पीने की चीज पीने की इच्छा न होना, गला और मुंह के भीतर गले हुए घाव या छाले होना। होंठ, जिह्वा और तालु की त्वचा उघड़ जाना, हाथ-पैर सब ठंडे हो जाना और नाड़ी का अत्यंत क्षीण होना। पानी की तरह पतले दस्त होना और उसके साथ रक्त या सफेद टुकड़े-टुकड़े, छिछड़े से निकलना; लगातार पेशाब की हाजत रहना, कम पेशाब होना और पेशाब के साथ जलन होना।

कैप्सिकम 30 —-पेट बहुत फूलना, जल्दी-जल्दी दस्त आना और उसके साथ काला रक्त रहना, कराहना, मलद्वार और मूत्रद्वार तथा मूत्रनली में जलन, मल होने के बाद प्यास, मुंह का स्वाद सड़ा, जरा-सा भी कुछ खाते ही पेटदर्द का बढ़ जाना आदि।

कोलोसिंथ 6, 30 — आमाशय में जल्दी-जल्दी थोड़ा करके अत्यंत कष्ट और कूथन के साथ दस्त, पेट में मरोड़ और खोंचा मारने की तरह दर्द, दर्द की धमक से रोगी एकदम घबराया-सा और कुब्जा हो जाता है, दोनों हाथों से पेट दबा रखता है; रोता है, मल होने के समय बहुत दर्द और वेग होता है, और मल हो जाने के बाद बहुत थोड़े समय के लिए रोगी स्वस्थ होता है। ये सब रक्तामाशय के लक्षण हैं। इस औषधि का हर बारे दस्त होने के बाद एकेक मात्रा प्रयोग करने से विशेष लाभ होता है। इसको लगाने और खाने दोनों तरह का प्रयोग होता है।

इपिकाक-6, 30 — कच्चे अथवा खट्टे फल खाकर रोग की उत्पत्ति। सब प्रकार के खाद्यों से अरुचि, मिचली या वमन, दस्त का रंग घास जैसा हरा, साथ ही मांड जैसा चिकना आंव, रक्त-मिश्रित आंव इत्यादि अनेक प्रकार के दस्त। रोग के लक्षण संध्या के समय बढ़ जाते हैं।

इरिजिरन 3x — पेशाब का कष्ट या पेशाब बंद रहने के साथ रक्त मिला थोड़ा-थोड़ा दस्त होता रहे और उसके साथ पेट और मलद्वार में जलन रहे, तो यह औषधि विशेष लाभ करती है।

हैपामेलिस 30 — काले रंग का रक्त या चपचपाता-सा रक्त अधिक मात्रा में निकले और उसके साथ पेट में ऐंठन का दर्द हो, तो इससे लाभ होता है।

लैकेसिस 3x, 6x — चॉकलेट जैसे रंग का मल, उसमें बहुत अधिक बदबू, मल होने के समय मलद्वार में जलन, पेट में खरोंच जैसा दर्द और पेट बहुत गरम मालूम होना, प्यास की अधिकता, जिल्ला का रंग सुर्ख या काला और जिह्वा फटी-फटी-सी रहना।

मर्क्युरियस सोल 6, 30 — मलद्वार का गल-सा जाना, मल होने के पहले पेड़ में काटने-फोड़ने या खरोंचने जैसा दर्द, मरोड़ और ऐंठन का असह्य दर्द, मल (दस्त) होते समय मलद्वार में जलन, डकार, मिचली, बेहोशी-सी हो जाना, जोर का शूल का दर्द, पसीना आना। मल होने के बाद रोगी का कराहना, जैसे मल खत्म होना ही नहीं चाहता, मलद्वार से कांच निकल आना, कंपकंपी आना, पेड़ में ठंड-सी मालूम होना, मुंह से सड़ी गंध-सी आना, शरीर में बात का दर्द होना, रात्रि में उपसर्गों का बढ़ना।

इस औषधि को प्रधान लक्षण हैं-पेट में प्रायः सर्वदा ही तेज दर्द रहता है, दर्द के कारण लगातार मल की हाजत-सी रहती है; रोगी मल-त्याग के लिए जाता है, पर मल (दस्त) बहुत थोड़ा होता है। बहुधा मल बिल्कुल ही नहीं रहता, केवल सफेद आंव या रक्त निकलता है, कभी-कभी निष्फल वेग रहता है अर्थात आंव या मल कुछ भी नहीं निकलता, पेशाब सहज में नहीं होता, पेशाब करने में भी कराहता है। डॉ० नैश का कथन है-रक्त गिरने और पेट में दर्द अधिक रहने परमर्क वाइवस और कराहाना तथा पेशाब करने में अधिक कष्ट होने परमर्क कोर लेनी चाहिए।

मर्क्युरियस कोर 6 — मल या दस्त आने के पहले, बीच, आखिर में मरोड़ का दर्द होना, कांखना (नक्सवोमिका से उल्टा; नक्सवोमिका में मल आने स पर चैन पड़ जाना है), थोड़ा-सा दस्त आना, रक्त मिला दस्त या आंव के टुकड़े मिला दस्त। मल में रक्त का अंश जितना अधिक होगा, यह औषधि उतनी ही अधिक निर्दिष्ट होगी, लाभ करेगी। गुदा में जलन होती है। पेशाब के लिए भी जोर लगाना पड़ता है पेशाब का बूंद-बूद आना। मर्क कोर को पेचिश में स्पैसिफिक कहा जा सकता है। जिह्वा पर दांतों के निशान पड़ जाते हैं, मुंह से बदबू आती है, मुंह में सैलाइवा भर जाता है, किंतु विलक्षणता यह है कि फिर भी प्यास लगती है।

एसिड नाइट्रिक 6, 30 — बहुत अधिक मात्रा में ताजा रक्त निकलना। मल होने के पहले-पेट में बहुत दर्द; मल होने के समय मलद्वार में भड़कन-सहित खिंचाव, मलद्वार के मुंह और मलांत्र में काटने-फाड़ने का-सा दर्द, मल होने के बाद मलद्वारे में जलन, शूल की तरह दर्द, कराहते रहने पर भी दस्त नहीं आना। नाड़ी का हर तीसरा स्पंदन सविराम होना।

सल्फर 30 — यदि ऊपर लिखी औषधियों से कोई लाभ न हो और मल होने के समय कांच निकल पड़े तथा मलद्वार में जलन और आंतों में काटने-फाड़ने जैसा दर्द हो, तो इससे लाभ होता है। इसमें पेट में चोट लगने जैसा और पेड़ में खुरचने जैसा दर्द होता है।

ट्राबिडियम 6, 30 — पुराने रक्तामाशय की यह एक अच्छी औषधि है। रक्त का भाग अधिक रहे और मर्क्युरियस आदि किसी भी औषधि से विशेष लाभ न हो, तो अंत में इसका प्रयोग करना चाहिए।

नक्सवोमिका 6, 30 — इसमें भी दस्तों में आंव तथा रक्त मिला रहता है, किंतु मल की मात्रा थोड़ी होती है, मल या दस्त में अभी और-अभी और” का अनुभव नहीं होता, किंतु थोड़ा-सा मल आने पर उस समय तो शांति पड़ जाती है, उसके बड़फिर आराम हो जाता है (मर्क कोर तथा मर्क सोल), मल या दस्त एक बारसे पूरा नहीं आता। पेट में कभी इधर-कभी उधर दर्द होता है। नक्सका रोगी:चिड़चिड़े स्वभाव का होता है, जरा-सी देर में गुस्सैला हो जाता है, बिगड़ जाता है, शीत-प्रधान होता है, सर्दी से अपने को बचाने के लिए कपड़ा लपेटे रहता है।

आर्सेनिक एल्बम30 — पेचिश के लक्षणों के.साथ रोग का मध्य-रात्रि में उभरना या बढ़ना, चूंट-घूट पानी की प्यास, रोगी गरम पानी पीने से स्वस्थ होता है, आभ्यंतर जलन और दर्द, हाथ-पैर ठंडे, बेहद कमजोरी तथा शक्तिहीनता, जिह्वा सूखने लगती है, भूरी और काली पड़ती जाती है, बदबूदार अनजाने दस्त निकल जाते हैं इन लक्षणों के साथ आर्सेनिक के मानसिक लक्षण-बेचैनी, शारीरिक तथा मानसिक वेदना एवं भयजनित-परेशानी होनी चाहिए।

फास्फोरस 30 — पेचिश के लक्षणों के साथ रोगी को ठंडे बरफ के समान ठंडे पानी को पीने की उत्कट इच्छा। पेचिश का दस्त ऐसे निकले, जैसे गुदा-द्वार बिल्कुल खुला पड़ा है।

कोलचिकम 6, 30 — जब दिन गरम और रात ठंडी हो, बसंत का मौसम हो, तब पेचिश के लक्षणों में यह उपयुक्त औषधि है। रोगी को भोजन की गंध सहन नहीं होती, उल्टी आने लगती है, बेहोशी तक हो सकती है।

शीत-ऋतु में पेचिश होने से एसक्लिपियस, पुराना आमाशय और आंतों में घाव हुआ है, ऐसी संभावना में अर्जेन्ट नाइ, बुरी सड़ी बदबूदार दस्त के साथ रक्तामाशय हो तो ऐसिड काबल, पेट में बहुत ज्यादा दर्द, कराहना, जोर का शूल का दर्द, सफेद आंव, रक्त, रक्तमिश्रित दस्त, दर्द में कम मल इत्यादि लक्षणों में आर्निका, पिंग-खांसी के साथ पेचिश के दस्त और आंव-रक्त में ड्रोसेरा, जबरदस्त आमाशय, आंत में घाव, मल थोड़ा, रक्त अधिक, पेट में दर्द, कष्ट के कारण कराहने पर कैलि फ्लोर, लसदार आंव के साथ रक्त, बराबर हाजत बनी रहना, पेट में काटने-फाड़ने जैसा दर्द, प्यास, हाथ-पैर ठंडे हो जाने पर कैलि नाइट्रिकम, मलेरिया ज्चर के साथ या उसके बाद बहुत कमजोरी के साथ रक्तामाशय और पोचिश में एलस्टोनिया 8 और 2x, रोगी बहुत दिनों से रोग भोग रह्य हो, किसी भी तरह स्थायी लाभ नहीं होता हो और पतले दस्त, आंव-रक्त, पेट में थोड़ा दर्द हो तो-चैपारो एमरगोसा 8 और 2x देना चाहिए।

डॉ० शुसलर का कथन है कैलि म्यूर इस रोग की एक मुख्य औषधि है। इसके अलावा-आंव यदि पीब की तरह मल के साथ निकलती हो, तो कैल्केरिया सल्फ, रोगी में मस्तिष्क की गड़बड़ी के लक्षण हों, अफारा या सड़ी बदबू के दस्त आते हों, तो कैल्केरिया फॉस, रक्त का भाग बहुत अधिक और उसके साथ ज्वर रहे, तो फेरम फॉस, पेट में बेतरह मरोड़ या ऐंठन हो और वह दबाने पर कम हो जाती हो, तो मैग फाँस लाभदायक है। शरद् ऋतु से लेकर शीतऋतु तक होने वाले रक्त या श्वेत आमाशय में अटिस्टा-इंडिका 2xदेनी चाहिए।

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