प्लेग का होम्योपैथिक इलाज [ Homeopathic Medicine For Plague ]

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पुराने जमाने में जब यह रोग फैलता था, तो पूरे गांव के गांव खाली हो जाते थे। एक व्यक्ति को श्मशान पहुंचाया जाता था, तब दूसरा ले जाने को तैयार मिलता था। एक के बाद एक मृत्यु होती रहती थी। इसका एक कारण यह भी था कि उस समय का चिकित्सा-क्षेत्र आज जितना परवान नहीं चढ़ा था। आज चिकित्सा-जगत ने। बहुत उन्नति की है। “प्लेग” एक घातक संक्रामक रोग है, जो विषैले कृमि से फैलता है। यह कृमि चूहे पर रहने वाली मक्खियों पर रहता है। ये मक्खियां चूहे के मर जाने या किसी अन्य कारण से जब एक चूहे’को छोड़ती हैं, तो दूसरे चूहे से लग जाती हैं। जब ये मक्खियां किसी मनुष्य को काट लेती हैं, तो उसके शरीर में मक्खी के कृमि प्रविष्ट हो जाते हैं, तब वह प्लेग-रोग का शिकार हो जाता है। इस रोग के रोगी को ज्वर चढ़ता है, प्यास अधिक लगती है। गले, बगल या जांघ की ग्रंथि सूज जाती है और पक कर वह पसयुक्त हो जाती है। यह रोग होने पर मृत्यु संभावित हो जाती है।

बेलाडोना 3x — रोग के आरंभ में जब तेज ज्वर, प्यास अधिक लगे, तब यह उपयोगी है।

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फास्फोरस 30 — जब प्लेग-रोग के आक्रमण के साथ न्युमोनिया हो जाए, तब यह औषधि दें।

लैकेसिस 30 — ज्वर, ग्रंथियों का सूज जाना, बेचैनी, सारे शरीर में पीड़ा और कमजोरी होने पर इस औषधि का प्रयोग करें।

इग्नेशिया 30, 200 — यह औषधि प्रतिरोध के रूप में प्रयुक्त की जा सकती है। इससे रोगी को लाभ होता है।

हाइड्रोसाएनिक एसिड 6 — रोगी का जबड़ा अकड़ जाए, मुंह से झाग निकलने लगें, होंठ नीले पड़ जाएं, रोगी की जीवनी-शक्ति लोप होने लगे, तब इस औषधि से लाभ की आशा की जा सकती है, इसे 6 शक्ति में प्रति आधा घंटा दें।

नेजा 3x, 6 — लैकेसिस से लाभ न होने पर यह औषधि देनी चाहिए। यह अधिक उपयोगी है।

सल्फर 30 — इस औषधि को भी प्रतिरोधक के रूप में प्रयोग किया जाता है।

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