पेट में दर्द का होम्योपैथिक इलाज [ Homeopathic Remedies for Stomach Pain ]

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इसे ‘गैस्ट्रोडायनिया’ भी कहते हैं। इसको हिन्दी में पाकाशय का शूल या जठर-वेदना कहते हैं। इसमें अग्रखंड के नीचे एक प्रकार का एक दर्द होता है। गैस्ट्रेल्जिया का दर्द एकाएक उत्पन्न हो जाता है, ऊपरी पेट में अग्रखंड के नीचे कसावट, खींचन, जलन, खोंचा मारना, ऐंठन या अकड़न की तरह एक प्रकार की भयानक यंत्रणादायक वेदना पैदा हो जाती है। यह दर्द पेट से पीठ में चला जाता है, उस समय पीठ में भयानक दर्द हुआ करता है। कष्ट के मारे रोगी रो पड़ता है, चिल्लाता है, कभी-कभी बेहोश भी हो जाता है, शीत आ जाता है, नाड़ी क्षीण और सूत-सी पतली हो जाती है।

किसी-किसी का पेट सिकुड़ जाता है। पेट पर हाथ रखने से धकधक करता है। इसका दर्द कभी-कभी दबाने से कुछ घटता है, इसलिए रोगी उसे हाथ से दबाए रखता है, किंतु कुछ का दबाने से और भी बढ़ जाता है। वह पेट पर हाथ लगाने नहीं देता। कभी-कभी यह दर्द पेट से सीने में एवं लैरिंग्स (स्वर-यंत्र) और छोटी आंत में चला जाता है। यह दर्द 5-10 मिनट से 2-3 घंटे तक रहता है, इससे अधिक नहीं। दो-तीन बार डकार आने, दो-तीन बार खट्टी के होने या थोड़ा-सा पेशाब होने पर दर्द घट जाता है। किसी-किसी रोगी को दर्द बंद होने पर ज्वर आ जाता है। इसके बाद कोई दूसरा कष्टदायक उपसर्ग नहीं रहता; पर कई घंटे या कई दिनों के बाद फिर होता है, इसी तरह चलता रहता है। गैस्ट्रेल्जिया – पाकस्थली का एक प्रकार का स्नायुशूल-जनित दर्द है।

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गैस्ट्रेल्जिया-दर्द – (1) रात में साधारणतः खाली पेट रहने पर बढ़ता है, कुछ खाने पर घट जाता है, (2) बाहर से दबाने पर दर्द घटता है, (3) एक आक्रमण से लेकर दूसरी बार के आक्रमण के समय तक डिस्पेप्सिया का कोई विशेष उपसर्ग नहीं रहता, (4) स्वास्थ्य प्रायः खराब नहीं होता, (5) उपसर्गों में स्त्रियों को स्नायुशूल (न्यूरेल्जिया), मूर्च्छावस्था (हिस्टीरिया) आदि प्रकट होते हैं, (6) अम्ल का लक्षण रहता भी है तो बहुत थोड़ा, (7) वमन के साथ या किसी भी दूसरी तरह से रक्तस्राव नहीं होता।

पाकस्थली का घाव – (1) इसका दर्द कुछ खाने से पाकस्थली के भरने पर ही बढ़ता है, (2) दर्द बाहर से दबाने पर बढ़ता है, (3) एक आक्रमण के समय से दूसरी बार के आक्रमण के समय तक मंदाग्नि (डिस्पेप्सिया) के अधिकांश लक्षण मौजूद रहते हैं, (4) स्वास्थ्य बहुत खराब हो जाता है, (5) उपसर्गों में स्त्रियों को हरित्पाण्डु-रोग (क्लोरोसिस), बाधक (रजोदोष) आदि होते हैं, (6) अम्ल का लक्षण बहुत अधिक रहता है, (7) वमन के साथ या अन्य किसी प्रकार से रक्तस्राव होता है और रक्त का वमन भी होता है।

कॉलिक-शूल – (शूल अथवा आंतों का दर्द) – इसमें आंतों के भीतर स्नायविक (न्यूरेल्जिक) दर्द होता है। दर्द की प्रकृति-मरोड़, खोंचा मारना, ऐंठन या अकड़न की तरह साधारणत: नाभि के चारों ओर अथवा पेट के दोनों ओर से दबाने पर दर्द घटता है, कभी-कभी बढ़ भी जाता है या ह्रास-वृद्धि कुछ भी नहीं होती। अंत में वायु इकट्ठी होती है, उससे पेट फूल जाता है और वह गड़गड़ाया करता है। मिचली, डकार, हिचकी, श्वास-कष्ट, पेशाब करने की इच्छा, कब्ज, बूंद-बूंद पसीना, हाथ-पैर और शरीर ठंडा, नाड़ी क्षीण इत्यादि लक्षण मौजूद रहते हैं। दो-चार बार वायु खुलने या दो-एक बार मल-त्याग के लिए जाने पर कष्ट कम हो जाता है।

पाकस्थली का कैंसर – यह साधारणत: पाकस्थली के कार्डियक-एण्ड में (जिस मार्ग से पहले-पहल खाद्य पाकस्थली में प्रवेश करता है, उस मुंह में) या पाकस्थली के पाइलोरिक-एण्ड में (पाकस्थली से जिस मार्ग से पहले-पहल खाद्य अांतों में प्रवेश करता है, उस मुंह में) इन दो ही स्थानों पर होता है।

पाइलोरिक-एण्ड के कैंसर में – सभी समय दर्द बना रहता है। भोजन के तीन-चार घंटे बाद समस्त खाए हुए पदार्थों का वमन, वमन में चूर-चूर पदार्थ, लाल आभा लिए हुए वमन, कॉफी की तरह का वमन, मल के साथ रक्त, रक्त-वमन न होना, कब्ज, सब समय भूख न लगना, पाचनशक्ति का घटना, दिनों-दिन कमजोर और कृश होते जाना इत्यादि।

चिकित्सा एवं औषधि का निर्णय – दर्द के समय रोगी को अच्छी मात्रा में गुनगुना पानी पिलाना चाहिए और पेट पर गरम पानी का सेंक करना चाहिए। आमतौर पर यह रोग गरिष्ट चीजें खाने, चाय-कॉफी, तंबाकू और जर्दा आदि उत्तेजक नशीले इत्यादि कारणों से होता है। इसलिए मूल कारण का पता लगाकर उसे दूर करने की कोशिश करनी चाहिए।

एबिस नाइग्रा 3, 30 – पाकस्थली के ऊपर अग्रखंड के स्थान पर सदैव ही ऐसा मालूम होना, मानो एक कड़ा ढेला अड़ा हो।

एब्रोटेनम – भांति-भांति के दर्द, रात में दर्द का बढ़ जाना, हमेशा ही दर्द बना रहना, एक बार भी उससे पीछा न छूटना।

अर्जेण्टम नाइट्रिकम 6, 30 – अग्रखंड और नाभि के बीच की किसी एक छोटी-सी जगह पर स्पर्श सहन न होने वाला दर्द, उसी स्थान से बहुत तेज आरंभ होकर क्रमश: सीना, पीठ, कंधा-चारों ओर फैल जाना। इसका दर्द धीरे-धीरे बढ़ता और धीरे-धीरे ही घटता है।

एसाफिटिडा 200 – पेट में वायु का इकट्ठा होना, लहसुन या मल के गंध की तरह बदबूदार डकार आना, नीचे की ओर से न निकलकर ऊपर की ओर से वायु का डकार में निकलना, कब्ज की अधिकता। रोग बंधे हुए समय का अंतर देकर आक्रमण करता है। पेट खाली रहने से कष्ट बढ़ता है। कुछ खा लेने पर घटता महसूस होता है।

बेलाडोना 30, 200 – एकाएक दर्द होता है और वैसे ही चला जाता है, बहुत यंत्रणादायक दर्द होता है, रोगी पीछे की ओर झुककर श्वास बंद करके पड़ा रहता है, दर्द पेट से पीठ में चला जाता है। बहुत प्यास लगती है, पर पानी पीते-ही कष्ट बढ़ जाता है। यह स्त्रियों का ऋतु समय का रोग है।

कैल्केरिया कार्ब 6 – पाकस्थली में ऐसा महसूस होना, जैसे एक भारी पत्थर अड़ा हुआ है, दर्द पेट से गले तक चढ़ता है, खट्टी डकारें आती हैं और खट्टा ही वमन होता है।

कैल्केरिया हाइपोफास 6, 30 – अकस्मात दर्द उठता है। एक आक्रमण से दूसरी बार के आक्रमण के बीच में दर्द का नामोनिशान भी नहीं रहता, रोगी समझता है कि पेट में वायु इकट्ठी होकर दर्द होता है, दर्द ऊपर की तरफ बढ़ता है, कभी भी नीचे नहीं उतरता। साधारणत: भोजन के दो घटे बाद यह दर्द पैदा होता है, उस समय थोड़ा-सा दूध या कुछ चबाकर खा लेने से दर्द घट जाता है। दर्द-पीठ, सीना और गले तक फैल जाता है, साथ की वमन और पेट में खोंचा मारने की तरह दर्द हुआ करता है।

कोलोसिंथ 30 – काटने-फाड़ने की तरह तीव्र दर्द। दर्द-सीना, पेट आदि शरीर के अन्यान्य स्थानों से आरंभ होकर क्रमश: पाकस्थली में चला आता है। इसका दर्द दबाने पर घटता है।

ग्रैफाइटिस 30 – रक्ताल्पता और हरित्पाण्डु रोगग्रस्त व्यक्तियों के लिए तथा जिन स्त्रियों को बाधक (रजोदोष), अर्श और कब्ज रोग हो, उनकी धातु के लिए यह औषध उपयोगी है ।

रियुमेक्स 3x – अग्रखंड की जगह से तीर बिंधने की तरह एक तरह का दर्द सीने और पीठ की ओर दौड़ता है, पाकस्थली और सीने में भयानक मरोड़ और तीर बिंधने की तरह दर्द हो। दर्द एक बार गले के ऊपर चढ़ता हो और एक बार पाकस्थली में नीचे उतरता हो, भोजन के बाद पेट फूल जाता हो, तो इससे लाभ होता है।

वेरेट्रम एल्बम 6 – इसका दर्द धीरे-धीरे बढ़ता है और धीरे-धीरे ही घटता है। हाथ-पैर ठंडे हो जाते हैं, किंतु माथा थोड़ा गरम रहता है।

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