श्वांस की परेशानियां का होम्योपैथिक इलाज [ Homeopathic Treatment For Breathing (Respiratory) Problems ]

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श्वास लेने और छोड़ने में कठिनाई होना। श्वास-प्रश्वास धीरे-धीरे चलना और फिर तेज हो जाना, पुनः धीमा होना और बंद हो जाना इस रोग की प्रक्रियाएं हैं। निम्न औषधियां इसके लिए लाभप्रद हो सकती हैं, यदि उन्हें सही समय और ठीक शक्ति में दी जाएं।

गिंडेलिया (मूल-अर्क) 30 — रोगी के गले से सायं-सायं की आवाज निकलती है, फेफड़ों से सीटी की-सी आवाज आती है; झागदार श्लेष्मा रहता है; श्वास-प्रश्वास धीरे-धीरे चलते हुए क्रमशः तेज हो जाता है, फिर धीमा होना प्रारंभ होता है तथा क्षण भर के लिए बंद हो जाता है। रोगी को निद्रा आते ही श्वास रुक जाता है, तब रोगी निद्रा से एक झटके में जाग उठता है ताकि भरपूर श्वास ले सके। वह लेटे हुए श्वास नहीं ले सकता, इसलिए उठकर बैठ जाता है। श्वास के ऐसे कष्ट में यह औषधि उपयोगी है। इसे प्रति 2 घंटे प्रयोग करें।

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चायना 30 — रोगी को श्वास लेने के लिए बड़ा प्रयत्न करना पड़ता है। उसे गला-सा घुटता प्रतीत होता है। सिर नीचा करने पर श्वास रुक जाता है। इस औषधि को हर दूसरे घंटे दें।

फाइटोलैक्का (मूल-अर्क) 3 — श्वास लेने से छाती में दर्द होता है, श्वास लेने में कठिनाई होती है। इसका मुख्य कारण छाती के नीचे की पसलियों में वात-रोग का होना होता है। इस औषधि के मूल-अर्क की 4-5 बूंद थोड़े-से पानी में डालकर प्रति 2 घंटे दें।

नैट्रम म्यूर 6 — श्वास लेने व छोड़ने में कठिनाई होती हो, तो इस औषधि को प्रति 4 घंटे दें।

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