अपेंडिक्स का होम्योपैथिक इलाज [ Homeopathic Medicine For Appendicitis ]

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बड़ी आंत से जहां छोटी आंत मिलती है, वहां आंत के टुकड़े जैसी एक छोटी-सी दुम-सी होती है, इसे ही “अपेंडिक्स” कहा जाता है। यह छोटी-सी आंत ही है, इसलिए इसे “उपांत्र” भी कहते हैं। इसकी सूजन को “अपेंडिसाइटिस” कहा जाता है। यह पेट के निचले हिस्से के दाईं तरफ होता है। इसकी सूजन से बहुत सख्त दर्द होता है। प्रदाह होने पर रोगी दर्द से घबड़ा उठता है, यहां तक कि इस कष्ट से मृत्यु, तक हो सकती है। इसलिए उसकी सर्जरी की आवश्यकता पड़ती है। दर्द का धीरे-धीरे बढ़ना और साथ ही साथ ज्वर और पाकाशय-यंत्र की क्रिया की गड़बड़ी से पैदा हुआ कष्ट इस रोग का प्रधान लक्षण है।

इस अवस्था में यदि प्रदाह अच्छा न हुआ, तो शरीर के दूसरे-दूसरे यंत्र भी आक्रांत होकर, रोगी की मृत्यु तक हो सकती है। इस रोग का नाम सुनते ही लोग हताश हो सर्जरी कराने को उद्यत हो जाते हैं, किंतु होम्योपैथिक मत से अच्छी तरह उपचार होने पर सर्जरी की आवश्यकता नहीं पड़ती। जिस प्रकार टिफ्लाइटिस का रोग होता है, यह रोग भी उसी प्रकार होता है। प्रदाह के कारण रस, रक्त इकट्ठा हो जाता है, तो अपेंडिक्स का मुंह बंद होकर कभी-कभी अपेंडिक्स फूल उठता है, ऐसा हो जाने पर उसे अपेंडिक्स का शोथ कहते हैं।

खान-पान की गड़बड़ी, गिर जाने के कारण, पेट में चोटादि लगने पर, दाहिने पुंट्टे के स्थान के ऊपर तलपेट में एकाएक तेज दर्द, ज्वर, अपेंडिक्स के स्थान पर स्पर्श सहन न होने वाला दर्द, मिचली, वमन, कब्जियत, सामान्य गैस्ट्रिक लक्षण — इस प्रकार के लक्षण मिलने पर रोग अपेंडिसाइटिस है, ऐसी धारणा करनी चाहिए। इसका प्रधान लक्षण है-तेज दर्द, तलपेट में शूल की तरह पीड़ा या एक प्रकार का धीमा-धीमा दर्द, जो हमेशा बना रहता है। दर्द तलपेट से निचले पेरिनियम (मलद्वार और अंडकोष के बीच के स्थान को “पेरिनियम” कहते हैं) और अंडकोश में फैल जाता है, थोड़ा-सा भी हिलने पर या पेट दबाने पर दर्द बढ़ता है। इस रोग में बहुत बार वमन नहीं होता। कठिन प्रकार के रोग के वमन के साथ हिचकी रहती हैं, प्यास बहुत अधिक लगती है, जिह्वा प्रायः सूखी नहीं रहती, लेकिन फटी-फटी रहती है।

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कब्जियत इस रोग का प्रधान उपसर्ग है, बच्चों के रोग में कभी-कभी अतिसार रहता है। दर्द का पहले पहल अनुभव होने के साथ ही साथ ज्वर भी दिखाई देता है। यहां एक बात का ध्यान रखना बहुत आवश्यक है कि पुरुषों का स्वाभाविक श्वास-प्रश्वास कलेजे पर ही अधिक होता है, इसे “एब्डोमिनल-रेसपिरेशन” कहते हैं, स्त्रियों को श्वास-प्रश्वास कलेजे पर ही अधिक दिखाई देता है, इसे “थोरासिक-रेसपिरेशन” कहा जाता है। अपेंडिसाइटिस में श्वास-प्रश्वास कलेजे पर ही अधिक स्पष्ट होता है। बहुत थोड़ी मात्रा में पेशाब उतरता है, उसके साथ ही एल्बूमेन और मूत्रनली में उत्तेजना रहती है।

रोग का सूत्रपात होते ही रोगी को संपूर्ण विश्राम करना और बिस्तर पर लेटे रहना पड़ेगा। पाकस्थली को विश्राम देना उचित है। जहां तक संभव हो आहार लघु और थोड़ा होना जरूरी है, कारण अधिक परिमाण में खाने पर ज्यादा मल संचय होगा। इस रोग में प्रायः कब्ज्यित रहती है, इसलिए बहुत ज्यादा मल आंत में रुका रहने पर आंतों की श्लैष्मिक-झिल्ली को उत्तेजित करेगा, नाड़ी फूलेगी, जल्द ही रोग के उपसर्ग आदि की वृद्धि हो जाएगी।

साधारण प्रदाह की चिकित्सा में जिन-जिन औषधियों का व्यवहार होता है, इस रोग में भी प्रायः उन्हीं सब औषधियों की आवश्यकता पड़ती है। जिन-जिन औषधियों से प्रदाह घटता है और जिनमें पीब पैदा न हो, सो पहले लक्षण के अनुसार वे ही सब औषधियों की व्यवस्था करने की आवश्यकता पड़ती है। पीब होने पर जिसमें सहज में ही निष्कांत होकर रोग आरोग्य हो जाय और जिसमें पीब की वृद्धि रुक जाए, उसी प्रकार की औषधियों का प्रयोग करना पड़ेगा।

रोग की प्रथमावस्था में — बेलाडोना, लैकेसिस, वेरेट्रम विरिड, मर्क्युरियस।

पीब होने पर — हिपर सल्फर, मर्क्युरियस, साइलीशिया, लैकेसिस, कैल्केरिया सल्फ, लाइकोपोडियम, माइरिष्ट्रिका 3x।

वमन में मल की गंध रहने पर — ओपियम, प्लम्बम, मर्क्युरियस।

बेलाडोना 30 — इलियोसिकैल-प्रदेश में अर्थात दाहिने पुढे के ऊपरी अंश में स्पर्श सहन न होने वाला दर्द होता है, हाथ से छूने नहीं देता; कपड़ा, बिस्तर की चादर का भार तक रोगी सहन नहीं कर सकता, हिलने-डुलने से डरता है, चित्त होकर चुपचाप सोया रहता है। उक्त लक्षण के साथ कै, मिचली, तीव्र ज्वर, सिरदर्द, संध्याकाल में ज्चर का बढ़ना, ज्वर के साथ पसीना इत्यादि रहने पर रोग की प्रथमावस्था में; जब साधारण शोथ हो, तब उसके लिए यही मुख्य औषधि है। उपांत्र-शोथ (अपेंडिसाइटिस) के निमित्त इस औषधि ने बहुत नाम पाया है। डॉ० कैंट का कथन है कि यह औषधि इस रोग में समस्त औषधियों की सिरमौर है। इसके लक्षण प्रायः वही हैं जो आइरिस टेनैक्स के हैं; यदि उससे लाभ न हो तो इसे प्रयोग में लाना चाहिए। पेट की तलहटी में दाईं तरफ भयंकर दर्द होता है, तनिक-सा स्पर्श या कर्कश शब्द को रोगी बर्दाश्त नहीं कर सकता; पीठ के बल लेटने तथा टांगे सिकोड़ लेने से रोगी को आराम मिलता है, किंतु सिरदर्द के कारण रोगी आगे को झुक नहीं सकता, ऐसा करने से रक्त सिर की तरफ जाता है, जिससे सिरदर्द और ज्यादा बढ़ जाती है। डॉ० कैंट ने लिखा है, यदि उपरोक्त लक्षण समान हों और रोगी किसी कपड़े को शरीर पर सहन न कर पा रहा हो, तब यह औषधि अवश्य दी जानी चाहिए।

प्रादाहिक अवस्था में बहुत अधिक यंत्रणा रहने पर औषध-सेवन के साथ ही बेलाडोना-लिनिमेंट (बेलाडोना मदर टिंक्चर-20 बूंद, ग्लिसरिन। आउंस) दर्द के स्थान पर धीरे-धीरे लगाकर गरम सेंक दें। इससे कष्ट शीघ्र घट जाएगा।

मर्क्युरियस सोल और मर्क वाइवस 30, 200 — बेलाडोना की अवस्था उतीर्ण होने पर और बेलाडोना के प्रयोग से 24 से 72 घंटे के भीतर कष्ट न घटने पर इसकी आवश्यकता पड़ सकती है। इलियोसिकेल-प्रदेश में लाल रंग का फूला हुआ स्थान कड़ा और गरम रहता है; जिह्म सूखी, लाल या सफेद, थुलथुली, मोटी, एक बार ठंडी, एक बार गरम, फीकी या लाल रंग की सुखश्री, कब्जियत, कभी कूथन के साथ आंव मिला मल निकलता है, पसीना आने पर भी उपसर्ग नहीं घटते-इन लक्षणों के रहते इस औषधि की आवश्यकता पड़ती है।

जिन्सेंग 6, 30 — इलियोसिकेल-प्रदेश में कांटा गड़ने की तरह दर्द होता है; सूजन, पेट में गड़गड़ और कलकल-सी आवाज होती है, रोगी सोने पर विकार की तरह बकता है।

हिपर सल्फर 30 — इलियोसिकेल की जगह सूजी, स्पर्श न सहन होने वाला दर्द, रोगी चित्त होकर घुटना ऊंचा कर दर्द घटाने के लिए चुपचाप सोया रहता है, लगातार मल-मूत्र का वेग होता है।

लैकेसिस 6 — डॉ० क्लार्क का कथन है कि तलपेट में दाईं तरफ काटता हुआ दर्द हो, पेट फूला हुआ हो, पेट पर स्पर्श सहन न हो, चिड़चिड़ाहट हो, तो प्रति दो घंटे इस औषधि को देना चाहिए और बीच-बीच में गन पाउडर 3x देते रहना चाहिए। यह उत्तम औषधि है। रोगी पीठ के बल टांगे समेट कर लेटा रहता है, नींद के बाद रोग बढ़ जाता है, गरम पेय नहीं ले सकता।

आइरिस टैनेक्स 3, 3x, 6 — तलपेट के दाहिनी ओर (अपेंडिक्स के स्थान पर) भयानक दर्द होता है, तनिक-सा दबाव भी सहन नहीं कर सकता; कब्ञ्यित, पित्त का वमन, कमजोरी आदि लक्षण में इस रोग की यह क्षेष्ठ औषध है। दिन में 2 घंटे के अंतर से 5-6मात्रा दें।

ब्रायोनिया 1X — पीठ की दाईं ओर नीचे के हिस्से में काटने की तरह का भयानक दर्द, जो जरा-सी हरकत से बढ़ जाए, रोग के स्थान को स्पर्श न किया जा सके, रोगी टांगे समेट कर इस ढंग से पड़ा रहे, जिससे कोई हरकत पेट तक न पहुंचे, श्वास लेने और छोड़ने में भी उसे कष्ट हो, प्यास की अधिकता हो। ऐसी अवस्था में रोगी का हरेक 3-4 घंटे में 1x तब तक देते रहें, जब तक दर्द शांत न हो जाए। रोग के अंत में सल्फर 30 की एक मात्रा दें, ताकि रोग का दुबारा आक्रमण न हो।

डायोस्कोरिया (मूल-अर्क) अथवा 3 — यदि अपेंडिसाइटिस का दर्द लगातार बना रहे, रोगी कभी भी दर्द से मुक्त न हो, पेट में वायु भरी हो, मरोड़ा उठता हो, पीठ पीछे की तरफ झुकने से रोगी को आराम मिले। मूल-अर्क देना हो तो गरम पानी में 3-4 बूंद डालकर थोड़ी-थोड़ी देर बाद तब तक देनी चाहिए, जब तक दर्द खत्म न हो जाए। यदि आगे की ओर झुकने से दर्द में लाभ हो, तो कोलोसिंथ 30 से निश्चय ही लाभ होगा।

मर्क सोल 3x तथा बेलाडोना 3x — यदि अपेंडिसाइटिस को एक-दूसरे के बाद देने से कुछ ही घंटों में रोगी को आराम हो जाता है। डॉ० क्लार्क का कथन है। कि अपेंडिसाइटिस के लक्षणों में यदि रोगी का कष्ट रात्रि में बहुत बढ़ जाता हो, तो मर्क सोले 6 देना चाहिए।

लाइकोपोडियम 1x — जब अपेंडिसाइटिस का तरुण (नया) आक्रमण निकल जाए, तो 15-20 दिन के अंतर में या महीने बाद एक-दो महीने तक इस औषधि को देते रहने से रोग का बार-बार आक्रमण नहीं होता। यह औषधि दाईं तरफ के रोग में कभी भुलाई नहीं जा सकती। पेट के दाएं हिस्से में दर्द होता है, दर्द मूत्राशय तक जा पहुंचता है। पेट गुब्बारे के समान फूल जाता है। सायं 4 से 8 बजे के बीच रोग बढ़ जाता है, रोगी को मीठी चीजों की इच्छा होती है। वह गरम पेय पीना चाहता हैं।

प्लम्बम 30 — इलियोसिकैल का स्थान फूला, बड़ा और कड़ा रहता है। जरा-सा भी हिलने-डुलने पर, छींकने से, खांसने पर, यहां तक कि स्पर्श करने पर भी दर्द बढ़ जाता है; समूचे पेट में दर्द रहता है, लगातार खट्टी डकारें आती हैं, मिचली रहती है; कब्जियत, जिह्वा सूखी, किनारा लाल रंग का (रक्तिम), बीच में भूरे रंग की लेप चढ़ी रहती है, प्यास की अधिकता।

रस-टॉक्स 6, 30 — दाहिनी ओर का तलपेट का प्रायः समूचा स्थान ही फूला और कड़ा रहता है, बैठने पर या दाहिना पैर हटाने पर दर्द बढ़ता है, बाईं ओर दलाकर सो नहीं सकता या सोने पर बहुत अधिक कष्ट होता है; चित्त होकर सोना या दाहिना पैर उठाकर सोये रहने पर थोड़ा आराम मालूम होता है, हाथ-पैरों में जलन होती है, रात में खूब पसीना आता है।

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